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ब्रांडेड कंपनियों और फैशन डिजाइनर्स के इस दौर में सबको मात दे रहे हैं गोंड कला से सजा ये जूते

डिंडोरी के 161 आदिवासी गोंड कलाकारों का ग्रुप  लोक कला को नयी पहचान दे रहा है.

डिंडोरी के 161 आदिवासी गोंड कलाकारों का ग्रुप लोक कला को नयी पहचान दे रहा है.

tribal folk art. आदिवासी गोंड चित्र कला कैनवास से लेकर पैरों को सुंदर बनाने वाले जूतों तक आ पहुंची है. आमतौर पर यह लोकक ...अधिक पढ़ें

जबलपुर. गोंड कला से भला कौन वाकिफ नहीं. अभी तक आपने इसे पेंटिंग्स, बॉल पेंटिंग्स के बाद कपड़ों पर देखा होगा. लेकिन अब ये उससे कहीं ज्यादा आगे निकल चुकी है. डिंडौरी जिले के कोल कलाकार अब अपनी कला से जूतों को संवार रहे हैं. डिजाइनर दुनिया के इस दौर में गोंड चित्रकला से सजे ये जूते अच्छे से अच्छे ब्रांडेड कंपनियों के जूतों को मात दे रहे हैं.

मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के आदिवासी कस्बे में रहने वाले 161 गोंड लोक कलाकार अब किसी के मोहताज नहीं रहे. वे खुद के दम पर अपने हुनर से आजीविका पा रहे हैं. सिर्फ मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश के कोने कोने से उनकी कला की डिमांड इतनी ज्यादा है कि दिन-रात काम करने के बाद भी समय कम पड़ रहा है. विदेशों से भी इन की कलाकारी के लिए कई प्रोडक्ट के ऑर्डर मिले हैं. अब तक कैनवास पर आदिवासी लोककला को देखते थे वह दरवाजे से लेकर जूते तक आ पहुंची है.

देश-विदेश से मांग
यह आदिवासी लोक कलाकार डिंडोरी जिले के पाटनगढ़ कस्बे में रहने वाले हैं. यह अब बड़े-बड़े शहरों में जाकर अपनी कलाकृतियों को सम्मान के साथ भेजते हैं और उन्हें उसे उचित आमदनी भी होती है. कोरोनाकाल के बाद लगे लॉकडाउन ने इन 161 आदिवासी कलाकारों को एकजुट कर दिया. अमूमन आदिवासी लोक कला को या तो सरकारी ढांचे के अनुरूप ही देखा जाता था या उसके स्वावलंबन के लिए सरकारी मदद की दरकार रहती थी. इन आदिवासी लोक कलाकारों ने इस मिथक को तोड़ा है और खुद ब खुद अपनी सोच में बदलाव लाते हुए स्वावलंबी बनने के लिए नई पटकथा की शुरुआत कर दी है.

आदिवासी लोककला की विदेशों में भी है डिमांड
जबलपुर में ये सभी कलाकार एकजुट होकर शहर, प्रदेश और देश भर से मिल रहे ऑर्डर्स को पूरा करने में जुटे हैं. अब ऑर्डर सिर्फ कैनवास की पेंटिंग के नहीं बल्कि दरवाजे, खिड़कियां, अलमारी या सेंटर टेबल टॉप हो या टी कॉस्टर हो या फिर किसी घर के फर्नीचर को आदिवासी लोककला से परिपूर्ण करना हो. सभी प्रोडक्ट यह कलाकार बखूबी मेहनत से बनाते हैं. आने वाले दिनों में विदेशों से आ रही डिमांड को देखते हुए यह कलाकार अब ऑनलाइन मोड पर भी जल्द अपने प्रोडक्ट्स बेचना शुरू करने जा रहे हैं. इसके लिए तमाम तक नहीं की प्रक्रियाओं को पूरा किया जा रहा है जिससे आदिवासी लोककला का विस्तार हो सके.

दरवाजे फर्नीचर और जूतों पर भी बिखेरते हैं कलाकारी
आदिवासी गोंड चित्र कला कैनवास से लेकर पैरों को सुंदर बनाने वाले जूतों तक आ पहुंची है. आमतौर पर यह लोककला अब आपके शू प्रिंट में, सेंटर टेबल टॉप पर, घर के दरवाजे या ऑफिस में रखे जाने वाले टी कॉस्टर पर भी देखने को मिलेगी. विशेष तौर पर आदिवासी लोककला को मौजूदा समय के अनुरूप ढाला जा रहा है. जिससे आदिवासी कलाकारों की कला सिर्फ सीमित दायरे में ना रह जाए इनकी आजीविका भी चलती रहे.

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