International Yoga Day : जबलपुर ही था योग गुरु महर्षि महेश योगी के जीवन का टर्निंग पॉइंट

आखिरी बार महर्षि का जबलपुर आना 29 अक्टूबर 1977 को हुआ था. जब वो राजा गोकुलदास के महल में रुके थे

Prateek Mohan Awasthi | News18 Madhya Pradesh
Updated: June 21, 2019, 5:45 PM IST
International Yoga Day : जबलपुर ही था योग गुरु महर्षि महेश योगी के जीवन का टर्निंग पॉइंट
स्मृतियां : महर्षि महेश योगी
Prateek Mohan Awasthi | News18 Madhya Pradesh
Updated: June 21, 2019, 5:45 PM IST
आज पूरे विश्व में योग दिवस मनाया गया. योग महोत्सव के इस दिन देश दुनिया को ध्यान औऱ योग से परिचित कराने वाले आध्यात्मिक गुरु महर्षि महेष योगी को भी इस दिन याद करना ज़रूरी हो जाता है.योग कहने को शरीरिक क्रिया है लेकिन जब तक उसमे ध्यान नहीं होता तब तक एकाग्रता नहीं पायी जा सकती. महर्षि महेश योगी ने यही संदेश पूरी दुनिया को दिया.
योग-साधना -महर्षि महेष योगी एक ऐसा नाम है जिनके साथ तप, तपस्या अनुशासन , ध्यान और योग जैसे गुण देश-दुनिया ने देखे है. दुनिया में भावातीत ध्यान योग को फैलाने और परिचित कराने वाले ऐसे महान योगी का काम सदियों तक भुलाया नहीं जा सकता. भावातीत ध्यान योग यानि भावों से परे इस ध्यान योग की ताकत को दुनिया की प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने भी माना. वैज्ञानिक भाषा में हम इसे थर्ड स्टेज ऑफ थर्मोडायनैमिक्स कहते हैं.
संस्कारधानी की याद-  जिस तरह आचार्य रजनीश ओशो को ज्ञान की प्राप्ति संस्कारधानी जबलपुर से हुई, उसी तरह महर्षि महेश योगी की साधना की शुरुआत भी जबलपुर से ही हुई थी. अपनी प्राथमिक शिक्षा उन्होंने जबलपुर के प्राचीन हितकारिणी स्कूल से पूरी की थी.

1941 का वो दिन- महर्षि का आध्यात्म की ओर झुकाव अपने जीवन के शुरुआती दौर से ही था. लेकिन इसकी शुरुआत 1941 से हुई, जब उन्होंने शहर और फिर सांसारिक मोह त्यागा. शहर के घमापुर चौक पर शंकराचार्य ब्रम्हानंद सरस्वती के प्रवचन चल रहे थे. उन्हे सुनने महर्षि वहां रुके और उनसे इतने प्रभावित हुए कि वो फिर वापस फिर कभी घर नहीं लौटे.

शंकराचार्य  की वसीयत-शंकराचार्य स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वती 1953 में ब्रम्हलीन हो गए. उनकी वसीयत में इस बात का उल्लेख मिला कि वे अपनी गद्दी महर्षि को देना चाहते थे. लेकिन काशी विद्वत परिषद ने माना था कि इस गद्दी को सिर्फ ब्राम्हण ही संभाल सकता है जबकि महर्षि कायस्थ थे. महर्षि को शंकराचार्य की गद्दी भले ही नहीं मिली हो लेकिन उनकी मंज़िल तो कहीं और थी, जो उनका इंतजार कर रही थी. महर्षि की कर्मभूमि-हर्षि ने ऋषिकेश में अपना आश्रम बनाया, यहीं अपने समय के मशहूर बीटल्स बैंड के सदस्य आए. बाबा की कुटिया में योग और ध्यान सीखा. बीटल्स को ढूंढ़ता हुआ विदेशी मीडिया ऋषिकेश पहुंचा. बीटल्स तो खोज ही लिए गए इसी के साथ महर्षि महेश योगी के योग और आसन के चमत्कार को दुनिया ने जाना.
अंतिम पग-आखिरी बार महर्षि का जबलपुर आना 29 अक्टूबर 1977 को हुआ था. जब वो राजा गोकुलदास के महल में रुके थे. महर्षि का जबलपुर से एक अलग ही आत्मीय लगाव था. जिसे वे कभी भुला न सके. घमापुर स्थित हनुमान टोरिया मंदिर में उनके नाम का प्रसाद आज भी सप्ताह के प्रत्येक शनिवार को बनता है जो स्विज़रलैंड तक जाता है.

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VIDEO : चौरासी कुटी देख भावुक हो गयीं बीटल्स की साथी

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First published: June 21, 2019, 4:16 PM IST
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