मेडिकल यूनिवर्सिटी घोटाला: जब कुलसचिव ही भ्रष्टाचारी, तो फेल स्टूडेंट्स पास होंगे ही, जानिए पूरी कहानी

मप्र मेडिकल यूनिवर्सिटी के कुलसचिव पर भ्रष्टाचार के जबरदस्त आरोप लग चुके हैं. (File)

मेडिकल यूनिवर्सिटी घोटाला: मध्य प्रदेश की एकमात्र इस यूनिवर्सिटी में विवाद बढ़ता जा रहा है. यहां के कुलसचिव पर भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध हो चुके हैं. अगर भ्रष्टाचार का खेल यूं ही चलता रहा तो स्टूडेंट्स का भविष्य खतरे में है.

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जबलपुर. मध्य प्रदेश की अकेली मेडिकल यूनिवर्सिटी बड़े विवाद में फंसती नजर आ रही है. इस पर स्टूडेंट्स को फर्जी तरीके से पास करने का आरोप तो लगा ही है, साथ ही एक और विवाद में इसकी किरकिरी तय नजर आ रही है.

News 18 की पड़ताल में ये खुलासा हुआ है कि इसके कुलसचिव जेके गुप्ता पर पहले से ही गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपी सिद्ध हो चुके हैं. गुप्ता प्रतिनियुक्ति पर हैं, जब्कि नियमों के मुताबिक, प्रतिनियुक्ति पर उच्च पद पर आए अधिकारी पर किसी तरह का आरोप नहीं होना चाहिए.

इन आरोपों से जूझ रहे कुलसचिव

News 18 के हाथ लगे दस्तावेज बताते हैं कि कुलसचिव जेके गुप्ता की नियुक्ति गलत तरीके से हुई है. जानकारी के मुताबिक, ये वही गुप्ता हैं जिन पर भ्रष्टाचार, सरकारी दस्तावेजों से छेड़छाड़ के आरोप हैं. इन्होंने एक बार आयुष विभाग के उच्च अधिकारियों को नजरअंदाज कर 73 कर्मचारियों के ट्रांसफर की नोटशीट खुद ही साइन करके मंत्री के पास भेज दी थी. हैरत की बात है कि नोटशीट के मुताबिक ट्रांसफर हो भी गए थे.

भ्रष्टाचार को लेकर खड़े हुए ये सवाल

फिलहाल मेडिकल यूनिवर्सिटी के हालात ऐसे हैं कि हर उच्च अधिकारी शक के घेरे में है. मेडिकल यूनिवर्सिटी के कुलपति टी एन दुबे, कुलसचिव जेके गुप्ता, उप कुलसचिव डॉक्टर तृप्ति गुप्ता से लेकर सभी पर नजर है. सभी को लेकर अब सवाल खड़े हो रहे हैं.

1- आखिर जिस शख्स पर भ्रष्टाचार और अन्य शिकायतें सिद्ध हो चुकी हैं क्या उसके माथे इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी के प्रमुख पद की जिम्मेदारी होनी चाहिए?

2- जिस माइंड लॉजिक्स कंपनी पर भ्रष्टाचार की शिकायत दी गई है क्या वह मनगढ़ंत है या इसमें भी कुलसचिव की कोई चाल है?

3- विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. टीएन दुबे अधिकांश समय भोपाल में रहते हैं. उन पर यह भी आरोप लगा है कि वह निजी डेंटल कॉलेज के एक गेस्ट हाउस में मेहमान बनकर रहते हैं. जबकि उस डेंटल कॉलेज की संबद्धता इसी विश्वविद्यालय से है.

4 - विश्व विद्यालय में कार्यरत डॉ. तृप्ति गुप्ता की शिकायत भाजपा विधायकों ने भी की है. ऐसे में सत्ताधारी दल के विधायकों की शिकायत के बाद भी कैसे उप कुलसचिव पद पर प्रतिनियुक्ति में आई डॉ. तृप्ति गुप्ता आरोपों के बावजूद अब तक हटाई नहीं गई?

5- मेडिकल विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलसचिव डॉ जेके गुप्ता पर तीन सदस्यीय जांच समिति अपना प्रतिवेदन सौंप चुकी है. बावजूद इसके आखिर इस मलाईदार पद पर उनकी नियुक्ति कैसे कर दी गई?

6- सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक प्रभारी कुलसचिव महोदय अनुकंपा नियुक्ति के जरिए सरकारी नौकरी पर आए थे. प्रभारी कुलसचिव तक के सफर में उन पर कई गंभीर आरोप लग चुके हैं. उनकी शैक्षणिक योग्यता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं आखिर इन मामलों की जांच क्यों अब तक नहीं हो पाई?

मरीजों की जान से खिलवाड़

RTI एक्टिविस्ट अखिलेश त्रिपाठी का कहना है कि कि मेडिकल यूनिवर्सिटी में कुछ तो गड़बड़ जरूर है. हालांकि सवाल यह भी उठता है कि जांच के बाद क्या वाकई कंपनी और दोषी अधिकारी कर्मचारियों पर कार्रवाई हो पाएगी. सबसे बड़ा सवाल तो यह है अगर ऐसा फर्जीवाड़ा किया जा रहा है तो फिर यह न केवल छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है, बल्कि उन मरीजों की जान से भी खिलवाड़ किया जाएगा, जिन का इलाज भविष्य में इस यूनिवर्सिटी से निकले डॉक्टर करेंगे.

इस वजह से उछल रहा मामला- क्या ये एक और व्यापम घोटाला

मध्य प्रदेश के बहुचर्चित व्यापम घोटाले की तर्ज पर एक और घोटाला नजर आ रहा है. जबलपुर जिले में स्थित मप्र मेडिकल यूनिवर्सिटी में भी उन स्टूडेंट्स को पास कर दिया गया, जो परीक्षा में ही नहीं बैठे थे. अगर स्टूडेंट्स इसकी शिकायत चिकित्सा शिक्षा विभाग को नहीं करते, तो ये घोटाला सामने नहीं आता. मामले में कॉन्ट्रेक्ट कंपनी माइंडलॉजिस्क पर शक जा रहा है. जानकारी के मुताबिक, मप्र मेडिकल यूनिवर्सिटी का जब रिजल्ट आया तो डेंटल और नर्सिंग के स्टूडेंट्स को हैरानी हुई. उन्हें पता चला कि वे स्टूडेंट्स भी पास हो गए जो परीक्षा में ही नहीं बैठे थे. स्टूडेंट्स को ये भी जानकारी हाथ लगी कि कम नंबर लाने वाले स्टूडेंट्स के नंबर बढ़ाए गए हैं. उन्होंने इसकी शिकायत चिकित्सा शिक्षा विभाग में कर दी.

कंपनी करने लगी आनाकानी

चिकित्सा शिक्षा विभाग ने जब शिकायत पर जांच के आदेश दिए तो कंपनी छात्र-छात्राओं के गोपनीय डेटा पर ही कुंडली मारकर बैठ गई. हांलांकि ठेका शर्तों के मुताबिक छात्र-छात्राओं का डेटा विश्वविद्यालय के सर्वर में ही सुरक्षित रखना था. लेकिन जानकारी मांगे जाने पर कंपनी ने बैंगलुरु स्थित अपना कार्यालय लॉकडाउन में बंद होने का हवाला दे दिया. इसके बाद मामले की छानबीन के लिए मेडिकल यूनिवर्सिटी के कुलसचिव डॉक्टर जेके गुप्ता की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई.

मामला और बड़ा होने की आशंका

कमेटी की जांच में पता चला कि माइंडलॉजिक्स, गोपनीय विभाग का बाबू और परीक्षा नियंत्रक के बीच सांठ-गांठ हुई है. परीक्षा नियंत्रक ने ई-मेल पर कई छात्रों के नंबर भी बुलवाए. जांच टीम को लगता है कि ये मामला और बड़ा हो सकता है. क्योंकि MBBS तक का रिजल्ट बनाने में भी माइंडलॉजिक्स कंपनी का हाथ होता है. कमेटी ने 10 दिन की जांच रिपोर्ट कुलपति के अनुमोदन के बाद चिकित्सा शिक्षा विभाग को भेज दी है. इस मामले की जांच अब लगातार जारी रहेगी.

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