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Navratri Special : जबलपुर का त्रिपुर सुंदरी मंदिर, तीन शहरों का समूह जहां हैं मनमोहक देवी

त्रिपुर सुंदरी मंदिर में शक्ति के रूप में तीन माताएं मूर्ति रूप में विराजमान हैं. इसलिए मंदिर के नाम को उन देवियों की शक्ति और सामर्थ्य का प्रतीक माना गया है.

त्रिपुर सुंदरी मंदिर में शक्ति के रूप में तीन माताएं मूर्ति रूप में विराजमान हैं. इसलिए मंदिर के नाम को उन देवियों की शक्ति और सामर्थ्य का प्रतीक माना गया है.

Navratri Special. माना जाता है मंदिर में स्थापित माता की मूर्ति भूमि से अवतरित हुई थी. यह मूर्ति केवल एक शिलाखंड के सहा ...अधिक पढ़ें

जबलपुर. नवरात्रि चल रही है. आज पंचमी है. हम आपको बताते हैं जबलपुर के प्रसिद्ध त्रिपुर सुंदरी मंदिर के बारे में. ये मंदिर कल्चुरी कालीन है और ये देवी दानवीर कर्ण की कुलदेवी थीं. त्रिपुर का अर्थ है तीन शहरों का समूह और सुंदरी का अर्थ होता है मनमोहक महिला. इसलिए इस स्थान को तीन शहरों की अति सुंदर देवियों का वास कहा जाता है.

संस्कारधानी जबलपुर आस्था श्रद्धा और संस्कारों के लिए जाना जाता है. माता त्रिपुर सुंदरी राज राजेश्वरी का मंदिर शहर से करीब 14 किमी दूर तेवर गांव में भेड़ाघाट रोड पर हथियागढ़ नामक स्थान पर स्थित है. 11वीं शताब्दी में कल्चुरी राजा कर्णदेव ने इसका निर्माण कराया था. यहां पर एक शिलालेख है, जिससे इसकी पुष्टि होती है. यहां साल भर भक्तों की आवाजाही रहती है. लेकिन नवरात्रि पर यहां की रौनक देखने लायक होती है. मां त्रिपुरसुंदरी की ख्याति पूरी दुनिया में फैली हुई है. उनके दर्शन के लिए देश प्रदेश से ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से आते हैं.

सपने में दिए मां ने दर्शन
त्रिपुर सुंदरी मंदिर के प्रथम पुजारी करीब 80 साल के रमेश दुबे बताते हैं कि उन्हें 10 साल की उम्र में मां भगवती ने सपने में दर्शन दिए थे. उन्होंने अपने त्रिपुर सुंदरी स्वरूप का स्थान बताया था. इसके बाद उन्होंने इस स्थान की खोज की. उस जमाने में यह भयानक जंगल हुआ करता था. जंगल के बीचों बीच एक बेल के पेड़ के नीचे उन्होंने त्रिपुर सुंदरी मां की प्रतिमा मिली और फिर उनकी सेवा शुरू कर दी.

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भूमि से अवतरित हुई मूर्ति
माना जाता है मंदिर में स्थापित माता की मूर्ति भूमि से अवतरित हुई थी. यह मूर्ति केवल एक शिलाखंड के सहारे पश्चिम दिशा की ओर मुंह किए अधलेटी अवस्था में मौजूद है. त्रिपुर सुंदरी मंदिर में माता महाकाली, माता महालक्ष्मी और माता सरस्वती की विशाल मूर्तियां स्थापित हैं. त्रिपुर का अर्थ है तीन शहरों का समूह और सुंदरी का अर्थ होता है मनमोहक महिला. इसलिए इस स्थान को तीन शहरों की अति सुंदर देवियों का वास कहा जाता है. चूंकि यहां शक्ति के रूप में तीन माताएं मूर्ति रूप में विराजमान हैं. इसलिए मंदिर के नाम को उन देवियों की शक्ति और सामर्थ्य का प्रतीक माना गया है.

त्रिपुर सुंदरी का वरदान
मां त्रिपुर सुंदरी मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है. मान्यता है त्रिपुर सुंदरी मां द्वापर युग में महादानवीर कर्ण की कुलदेवी थी. कर्ण त्रिपुर सुंदरी मां की श्रद्धा भाव से सेवा करता था. त्रिपुर सुंदरी मां ने कर्ण को वरदान दिया था कि वह चाहें जितना भी दान करले उसके खजाने में हमेशा सवा मन सोना बना रहेगा.

5 हजार साल पुरानी प्रतिमा
त्रिपुर सुंदरी मंदिर समिति के पुजारी बताते हैं कि त्रिपुर सुंदरी मंदिर की खास बात यह है कि यह पुरातात्विक महत्व रखता है. पुरातत्व विभाग ने भी त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमा की जांच कर बताया है यह प्रतिमा करीब हज़ारों साल पुरानी है. लेकिन धार्मिक मान्यताएं बताती हैं यह मूर्ति 5000 साल से भी ज्यादा पुरानी है. खास बात यह है कि मां भगवती त्रिपुर सुंदरी की प्रतिभा जिसमें महालक्ष्मी महासरस्वती और महाकाली का स्वरूप है, ये संसार में कहीं और देखने नहीं मिलतीं. त्रिकूट पर्वत स्थित मां वैष्णो देवी में भी इन तीनों देवियों का पिंडी स्वरूप है. केवल त्रिपुर सुंदरी मंदिर ही ऐसा मंदिर है जहां देवियों का प्रतिमा स्वरूप मिलता है और यही इस मंदिर को खास बनाता है. मंदिर में लाखों की संख्या में लोग हर साल आते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए मां के दरबार में नारियल बांधते हैं.

किवदंतिया  और मान्यताएं
मंदिर से जुड़ी बहुत सी किवदंतिया  और मान्यताएं हैं. लेकिन मां जगदंबा का आशीर्वाद जिन भक्तों पर पड़ता है उनका इस मंदिर में आना तय होता है. त्रिपुर सुंदरी मंदिर में हर साल नवरात्र से लेकर आम दिनों तक लाखों श्रद्धालु आते हैं. मंदिर का एक और आकर्षण का केंद्र यहां प्रज्वलित ज्योत है जो निरंतर वर्ष 1951 से आज तक प्रज्जवलित है. लगभग 71 वर्षों से अखंड ज्योत जलना अपने आप में इसकी विशेषता को दर्शाता है.

नारियल बांधने की परंपरा
मान्यताओं के मुताबिक इस मंदिर में मनोकामना पूर्ति के लिए नारियल बांधने का विशेष महत्व माना गया है. दूरदराज क्षेत्रों से यहां आने वाले भक्त अपनी मनोकामना के साथ एक नारियल और चुनरी बांधते हैं. मनोकामना पूर्ण होने पर यहां आकर उसे खोलते हैं. मंदिर में स्थापित मूर्ति के संबंध में कहा जाता है कि 1985 के पूर्व इस स्थान पर एक किला था, जिसमें यह प्राचीन मूर्ति थी. वहां पास में ही एक गड़रिया रहता था जो मूर्ति के पास अपनी बकरियां बांधता था. मूर्ति का मुख पश्चिम दिशा की ओर था. बाद में धीरे-धीरे यहां कुछ अन्य विद्वानों का आना हुआ और मंदिर का विकास कार्य किया गया.

Tags: Madhya pradesh latest news, Navratri Celebration

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