खेल दिवस: तीरंदाजों को नहीं मिल रही पर्याप्त डाइट, कैसे मिलेगा देश को मेडल
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खेल दिवस: तीरंदाजों को नहीं मिल रही पर्याप्त डाइट, कैसे मिलेगा देश को मेडल
मध्य प्रदेश के झाबुआ जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के तीरंदाजों का सपना देश के लिए ओलंपिक में मेडल जीतना है लेकिन ये लोग पोषण आहार से जूझ रहे हैं

मध्य प्रदेश के झाबुआ जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के तीरंदाजों का सपना देश के लिए ओलंपिक में मेडल जीतना है लेकिन ये लोग पोषण आहार से जूझ रहे हैं

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मध्य प्रदेश के झाबुआ जैसे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के तीरंदाजों का सपना देश के लिए ओलंपिक में मेडल जीतना है लेकिन ये लोग पोषण आहार से जूझ रहे हैं.

खेल दिवस खेल और खिलाड़ियों दोनों के लिए खास होता है. खेलों में मेडल की आस लगाई जाती है, लेकिन क्या वाकई सुविधाएं और तैयारी भी ऐसी होती है.

झाबुआ के युवाओं का सपना है कि वो भी मेडल जीतें जिसके लिए ये जी जान से जूटे हैं, लेकिन इन सभी ग्रामीण खिलाड़ियों को पोषण आहार की दिक्कत का सामना करना पड़ता है.
खेल अकादमियों में खिलाड़ियों को पोषण के साथ-साथ छात्रवृत्ति की सुविधा होती है, लेकिन झाबुआ के फीडर सेंटर के युवा तीरंदाज इस सुविधा से वंचित हैं. खिलाड़ियों की मांग है कि उनके खाने और पोषण पर ध्यान दिया जाए ताकि वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें.



झाबुआ के बहुउद्देशीय खेल परिसर पर तीरंदाजी के लिए फीडर सेंटर संचालित होता है, जिसमें 40 खिलाड़ी रोज तीरंदाजी का अभ्यास करते हैं, जिनमें 20 लड़के और 20 लड़कियां शामिल हैं. इसी सेंटर में भंवरपिपलिया गांव की सोनू, रजला गांव के पंकज, जयंती और बामन सेमिलया गांव के कैलाश अभ्यास करते हैं. कैलाश राष्ट्रीय स्तर पर भी तीरंदाजी में जिले और प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. इन सबका सपना देश के लिए ओलंपिक मेडल लाना है.



झाबुआ के जिला खेल अधिकारी सेंटर को धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय तीरंदाजी मानकों के अनुरूप तैयारी के बात कह रहे हैं. लेकिन खिलाड़ी को मैदान में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए पोषण आहार की भी जरूरत है, जिससे ये खिलाड़ी अभी वंचित हैं.
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