भैरव पूर्णिमा : झाबुआ में हैं चुनावी भैरव, जो चुनाव में प्रत्याशी को देते हैं जीत का आशीर्वाद...

Jhabua.जीत की कामना के साथ प्रत्याशी बाबा के दरबार में सबसे पहले हाजिरी लगाते हैं.

Jhabua.जीत की कामना के साथ प्रत्याशी बाबा के दरबार में सबसे पहले हाजिरी लगाते हैं.

Jhabua. लोगों का विश्वास है कि 1967 से चुनावी भैरव का आशीर्वाद मिलता आ रहा है. साल दर साल जीत (Victory) के बाद चुनावी भैरव की ख्याति बढ़ती गई. बस शर्त यही है कि बाबा के दरबार में सबसे पहले हाजिरी लगाने वाले को जीत का आशीर्वाद मिलता है.

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झाबुआ. देश भर में आज भैरव पूर्णिमा मनाई जा रही है. वैसे तो भैरव के 52 रूप माने गए हैं. लेकिन एक अनोखा रूप भैरव का झाबुआ (Jhabua) में है जिन्हें चुनावी भैरव कहा जाता है. मान्यता है कि वो चुनाव में जीत का आशीर्वाद देते हैं.

देश भर में भैरव पूर्णिमा धूम-धाम से मनाई जा रही है. भैरव के 52 रूप माने गए हैं. इनमें काशी के काल भैरव, दिल्ली के बटूक भैरव, काला भैरव, गौरा भैरव के नाम अक्सर चर्चा में रहते हैं. उज्जैन के काल भैरव की ख्याति भी दूर-दूर तक है. लेकिन झाबुआ में बाबा भैरव का अलग ही रूप है. वो है चुनावी भैरव.

संकरी गली में बड़ा चमत्कार

झाबुआ के थांदला में संकरी गली के बीच एक छोटा सा लेकिन चमत्कारी चुनावी भैरव का मंदिर है. ऐसा माना जाता है कि जो चुनाव प्रचार के दौरान यहां सबसे पहले अपना पर्चा चढ़ा जाए और अपनी जीत की कामना कर जाए उसकी जीत पक्की है. पार्षद से लेकर सांसद तक के चुनाव में उम्मीदवार बाबा चुनाव भैरव के दरबार में पहुंचते हैं. जीत की दुआ मांगते हैं. अपना चुनावी पर्चा चढ़ाते हैं.
इनकी जीत का राज

रतलाम-झाबुआ सांसद बी गुमान सिंह डामोर ने भी अपना पर्चा यहां चढ़ाया था और उन्हें जीत का आशीर्वाद भी मिला. पार्षद से लेकर सांसद तक के चुनाव उम्मीदवार यहां पहुंचते हैं. थांदला नगर पालिका के अध्यक्ष बंटी डामोर और निर्दलीय पार्षद समर्थ उपाध्याय भी नगर पंचायत चुनाव के दौरान यहां पहुंचे थे. वो अपनी जीत को बाबा का चमत्कार ही मानते हैं.

कांतिलाल की जीत का इतिहास



कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया भी हर चुनाव के पहले यहां अपना चुनावी पर्चा चढ़ाने पहुंचते हैं. 5 बार से वे सांसद हैं. लेकिन इस बार वे यहां नहीं पहुंच पाए हैं. इस छोटे से मंदिर के पुजारी का कहना है बाबा चुनावी भैरव को किसी पार्टी से कोई मतलब नहीं है. जो यहां पहले आता है. वो जीत जाता है.

पहले आओ पहले पाओ

चुनावी भैरव की स्थापना को लेकर एक दिलचस्प कहानी है. चुनाव प्रचार से परेशान कुछ लोगों ने उम्मीदवार को बाबा की शरण में पहुंचाया. और चमत्कार हुआ. वो प्रत्याशी जीत गया. बताया जाता है कि 1967 से चुनावी भैरव का आशीर्वाद लोगों को मिलता आ रहा है. साल दर साल जीत के बाद चुनावी भैरव की ख्याति बढ़ती गई. बस शर्त यही है कि बाबा के दरबार में सबसे पहले हाजिरी लगाने वाले को जीत का आशीर्वाद मिलता है.


हर प्रत्याशी लगाता है हाजिरी

देश भर में अपनी तरह के अनोखे इस चुनावी भैरव मंदिर की अपनी महिमा है. तभी तो यहां चाहे जैसा भी चुनाव हो जीत की कामना के साथ प्रत्याशी बाबा के दरबार में सबसे पहले हाजिरी लगाते हैं.

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