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झाबुआ की शान कड़कनाथ मुर्गे को कुछ इस तरह बचाया जा रहा है बर्ड फ्लू से

मुर्गों के बाड़े में जाने से पहले हाथ पैर सब साफ करवाए जाते हैं.
मुर्गों के बाड़े में जाने से पहले हाथ पैर सब साफ करवाए जाते हैं.

झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे (Karkanath chicken) का खून काला होता है. इसकी कद-काठी आम मुर्गों की तुलना में ऊंची होती है और इसका मांस प्रोटीन युक्त होता है.

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झाबुआ.देश-प्रदेश में बर्ड फ्लू (bird flu) की दस्तक और आशंका के बीच झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे (Karkanath chicken) की चिंता प्रशासन और पशुपालकों को सताने लगी है. मुर्गे की सुरक्षा के लिए कड़े इंतज़ाम और सावधानियां बरती जा रही हैं.

देश के अलग-अलग राज्यों में बर्ड फ्लू के बढ़ते मामलों के बीच झाबुआ के प्रसिद्ध कड़कनाथ मुर्गे की हिफाज़त के लिए सब सतर्क हो गए हैं. उसकी रखवाली के लिए सुरक्षा इंताजाम और सावधानियां बढ़ा दी गई हैं.हालांकि वैसे तो इस बेमिसाल मुर्गे के लिए सालभर यहां पर सावधानियां बरती जाती हैं. लेकिन बर्ड फ्लू की आशंका के कारण अब ये चिंता ज़्यादा बढ़ गयी है.

लगातार दवा का छिड़काव
इस दुर्लभ मुर्गे तक कहीं बर्ड फ्लू न पहुंच जाए इसलिए इनके बाड़ों में दवाई का स्प्रे शुरू कर दिया गया है. यहां हर दो दिन में दवा का छिड़काव किया जा रहा है.साथ ही पक्षियों की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए देसी तरीके अपनाए जा रहे हैं.कृषि विज्ञान केन्द्र के हैचरी में मुर्गियों को पानी में हल्दी घोलकर दी जा रही है. इसके साथ बाहरी पक्षियों और व्यक्तियों के आने-जाने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है.




ऐसे हैं इंतज़ाम
झाबुआ की सरकारी कड़कनाथ मुर्गी फार्म के प्रभारी डॉ. दिवाकर और कृषि विज्ञान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. आई.एस तोमर ने बताया कि यहां साल भर सुरक्षा इंतजाम किए जाते हैं.यहां बाहरी लोगों की आवाजाही पर रोक रहती है. फार्म में काम करने वाले लोगों के लिए मास्क और हेड कैप पहनना जरूरी है. सभी लोग हाथ धोने के बाद ही रूम में जाते हैं. पैरों को साफ करने के लिए चूने वाली टाट का विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाता है. इस समय बर्ड फ्लू की आशंका बनी हुई है. ये बीमारी कड़कनाथ मुर्गे तक ना पहुंचे इसके लिए सावधानियां बरती जा रही हैं.

लोगों से अपील
कड़कनाथ मुर्गी फार्म के प्रभारी डॉ. दिवाकर और कृषि विज्ञान केन्द्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. आई.एस तोमर ने लोगों से सावधान रहने की अपील की है.नॉनवेज के शौकीन लोग मुर्गे को अच्छे से पकाकर खाएं क्योंकि 56 डिग्री से ज्यादा तापमान में बर्ड फ्लू का वायरस जिंदा नहीं रहा पाता है. निजी तौर पर मुर्गी पालन करने वाले लोगों को  विशेषज्ञों ने सलाह दी  है कि बर्ड फ्लू की आशंका के कारण अभी अपने फार्म में बाहर से नये पक्षियों को ना लाएं. फिलहाल झाबुआ में बर्ड फ्लू का कोई मामला सामने नहीं आया है लेकिन बाहरी पक्षियों के आने से यहां भी वायरस आ सकता है.
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