बहुत कम लोग जानते हैं इस इतिहास के बारे में, भगवान शिव और मां पार्वती से है संबंध

झाबुआ का पुराना शिव मंदिर उपैक्षा का शिकार है.

झाबुआ का पुराना शिव मंदिर उपैक्षा का शिकार है.

भगौरिया उत्सव. काफी लोग जानते हैं कि ये मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचलों का उत्सव है. लेकिन, बहुत कम लोग ये जानते हैं कि इसका संबंध भगवान शिव और मां पार्वती से भी है. झाबुआ का प्राचीन मंदिर इसका गवाह है.

  • Last Updated: March 22, 2021, 12:58 PM IST
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झाबुआ. आदिवासी अंचल का लोकपर्व भगौरिया सोमवार से आलीराजपुर में शुरू होने जा रहा है. कम लोग ही जानते हैं कि इसकी शुरूआत कहां से हुई और किसने की. कोई इसे भव और गौरी यानी शिव-पार्वती से भी जोड़ता है, तो कोई इसे भृगु ऋषि की तपोस्थली बताता है.

आपको बता दें कि इसकी शुरुआत झाबुआ के भगोर गांव से हुई. झाबुआ जिला मुख्यालय से करीब 15 किमी दूर ये छोटा गांव है. भगोर में बिखरे भग्नावशेष इस गांव की प्राचीनता की गवाही देते हैं. इसी जगह से जुड़ा है यहां का 11 वीं सदी का शिव मंदिर.ये प्राचीन मंदिर लापरवाही और अनदेखी की भेंट चढ़ रहा है. भव-गौरी के इस प्राचीन मंदिर की न तो प्रशासन ने कभी सुध ली और न ही पुरातत्व विभाग ने इससे कोई सरोकार रखा. नतीजा ये है कि आज भी मंदिर के भग्नावशेष इधर-उधर बिखेरे पड़े हैं.

लापरवाही की धूल खा रहे शिलालेख और अवशेष

इतिहासकार केके त्रिवेदी बताते हैं कि कई पुरातात्विक महत्व के शिलालेख और अवशेष यहां  लापरवाही की धूल खा रहे हैं. भगोर में एक बड़ा सा तालाब भी है. कई पत्थरों पर यहां पहेलियां लिखी हैं. इतिहासकार के मुताबिक, कहा जाता है कि प्राचीन व्यापारिक केन्द्र होने से यहां बड़ा खजाना भी हो सकता है. यहां के खजाने को लेकर लोकश्रुतियों में एक पहेली का जिक्र किया जाता है. ये पहेली यहां हर किसी के जुबान पर होती है- एक तीर अरे, एक तीर परे, बीच में नौ सौ गेंडा माल तरे’.
भव और गौरी से हुआ गांव का नामकरण

त्रिवेदी बताते हैं कि यहां पड़े शिलालेखों पर कई उक्तियां भी लिखी हुई है. लेकिन, क्या लिखा है कम ही लोगों को पता है. इसी भगोर गांव का संबंध शिव पार्वती से भी बताया जाता है और इसी भगोर से भगौरिया की शुरूआत मानी जाती है. भगोर का नामकरण भी भव और गौरी से हुआ है. भव यानी की भगनवान शिव और गौरी यानी की पार्वती. भगवान शिव को आदिवासी समाज में भोंगर देव भी कहा जाता है.

भग्गा ने फिर से बसाया था भगोर



कथाओं के मुताबिक, भगोर उजड़ने के बाद इसे फिर से 15 वीं शताब्दी ने भग्गा नायक नाम  के लबाना सरदार ने बसाया और यहां व्यापारिक गतिविधियों को फिर से शुरू किया. उन्होंने हाटबाजारों को प्रचलित किया. समय के साथ-साथ ये बाजार होली के पहले पड़ने वाला त्यौहारी हाट  भगोरिया बना गया. भगोर से शुरू हुआ भगोरिया झाबुआ समेत पूरे मालवा-निमाड़ अंचल में फैल गया.

जब देवी ने कर दिया था भगोरिया भेरू का सिर कलम

भगोर के उजड़ने की एक और जनश्रुति प्रचलित है. कहा जाता है कि भगोर में बड़ा सा तालाब माता झमा ने बनाया था. माता झामा जब अपने लाव-लश्कर के साथ भगोर पहुंचीं, तब भगोरिया भेरू ने उनका हाथ पकड़ लिया. इसके बाद क्रोध में आकर देवी ने उसका सिर कलम कर दिया. लोग मानते हैं वो सर कटी भोंगर देव या भगोरिया भेरू की मूर्ति आज भी भगोर में है, जिसकी लोग पूजा करते हैं. यहीं पर खजाना छिपे होने की बात भी कही जाती है.
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