इंडिया के इस रॉबिनहुड को सलामी देने दो मिनट रुकती है हर ट्रेन
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इंडिया के इस रॉबिनहुड को सलामी देने दो मिनट रुकती है हर ट्रेन
प्रदेश के रॉबिनहुड और आजादी के जननायक टंट्या मामा भील के मंदिर के पास से गुजरने वाली ट्रेनें उन्हें दो मिनट सलाम करती हैं. जिसके बाद ही ट्रेन में सवार यात्री सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच पाते हैं.

प्रदेश के रॉबिनहुड और आजादी के जननायक टंट्या मामा भील के मंदिर के पास से गुजरने वाली ट्रेनें उन्हें दो मिनट सलाम करती हैं. जिसके बाद ही ट्रेन में सवार यात्री सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच पाते हैं.

  • Pradesh18
  • Last Updated: December 4, 2016, 2:24 PM IST
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मध्य प्रदेश के रॉबिनहुड और आजादी के जननायक टंट्या मामा भील के मंदिर के पास से गुजरने वाली ट्रेनें उन्हें दो मिनट सलाम करती हैं. जिसके बाद ही ट्रेन में सवार यात्री सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच पाते हैं.

4 दिसंबर को देश की आजादी के जननायक और आदिवासियों के हीरो टंट्या मामा भील की पुण्यतिथि है. इस मौके पर प्रदेश18 आपको जननायक से रूबरू करा रहा हैं.

बताते हैं कि, अंग्रेजों ने टंट्या भील को फांसी देने के बाद उनका शव पातालपानी के कालाकुंड रेलवे ट्रैक के पास दफना दिया था. कहते हैं कि टंट्या मामा का शरीर तो खत्म हो गया, लेकिन आत्मा अमर हो गई.



इस हत्या के बाद से यहां लगातार रेल हादसे होने लगे. इन हादसों का शिकार होने लगे. लगातार होने वाले इन हादसों के मद्देनजर आम रहवासियों ने यहां टंट्या मामा का मंदिर बनवाया. तब से लेकर आ तक मंदिर के सामने हर रेल रुकती है और मामा प्रतीकात्मक सलामी देने के बाद अपने गंतव्य तक पहुंचती है.
रेलवे की दूसरी कहानी 

हालांकि, रेलवे अधिकारी इस कहानी को सिरे से नकारते हैं. रेलवे की मानें तो यहां से रेल का ट्रैक बदला जाता है. पातालपानी से कालाकुंड का ट्रैक काफी खतरनाक चढ़ाई है, इसलिए ट्रेनों को ब्रेक चेक करने के लिए यहां रोका जाता है. चूंकि यहां मंदिर भी बना है, इसलिए सिर झुकाकर ही आगे बढ़ते हैं.

मंदिर के सामने ट्रेन नहीं रुकी, तो एक्सीडेंट 

स्थानीय लोग बताते हैं कि जब-जब ट्रेन यहां रोकी नहीं गई, तब-तब यहां रेल एक्सीडेंट हुए हैं. जिसके चलते अब कोई भी ट्रेन यहां से गुजरने से पहले टंट्या मामा को सलामी जरूर देती है.

जानिए, कौन है 'टंट्या माम भील' 

इतिहासकारों की मानें तो खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन 1842 के करीब भाऊसिंह के यहां टंट्या का जन्म हुआ था. पिता ने टंट्या को लाठी-गोफन व तीर-कमान चलाने का प्रशिक्षण दिया. टंट्या ने धर्नुविद्या में दक्षता हासिल कर ली, लाठी चलाने और गोफन कला में भी महारत प्राप्त कर ली.  युवावस्था में अंग्रेजों के सहयोगी साहूकारों की प्रताड़ना से तंग आकर वह अपने साथियों के साथ जंगल में कूद गया.

रॉबिनहुड बनने की कहानी 

टंट्या एक गाँव से दूसरे गांव घूमता रहा. मालदारों से माल लूटकर वह गरीबों में बांटने लगा. लोगो के सुख-दुःख में सहयोगी बनने लगा. इसके अलावा गरीब कन्याओं की शादी कराना, निर्धन व असहाय लोगो की मदद करने से ‘टंट्या मामा’ सबका प्रिय बन गया. जिससे उसकी पूजा होने लगी.

अमीरो से लूटकर गरीबों में बांटने के कारण वह आदिवासियों का रॉबिनहुड बन गया. बता दें कि रॉबिनहुड विदेश में कुशल तलवारबाज और तीरंदाज था, जो अमीरो से माल लूटकर गरीबों में बांटता था.

इन क्षेत्रों से तक प्रभाव 

टंट्या का प्रभाव मध्यप्रांत, सी-पी क्षेत्र, खानदेश, होशंगाबाद, बैतुल, महाराष्ट्र के पर्वतीय क्षेत्रों के अलावा मालवा के पथरी क्षेत्र तक फ़ैल गया. टंट्या ने अकाल से पीड़ित लोगों को सरकारी रेलगाड़ी से ले जाया जा रहा अनाज लूटकर बटवा दिया. टंट्या मामा के रहते कोई गरीब भूखा नहीं सोएगा, यह विश्वास भीलों में पैदा हो गया था.

तब देखने को मिली लोकप्रियता  

अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाला टंट्या मामा गरीबों की मदद करने के कारण बड़ा लोकप्रिय था. इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब 11 अगस्त, 1896 को उसे गिरफ्तार करके अदालत में पेश करने के लिए जबलपुर ले जाया गया. इस दौरान टंट्या की एक झलक पाने के लिए जगह-जगह जनसैलाब उमड़ पड़ा था.

जिसके बाद 19 अक्टूबर 1889 को टंट्या को फांसी की सजा सुनाई गयी और महू के पास पातालपानी के जंगल में उसे गोली मारकर फेंक दिया गया था. जहां पर इस ‘वीर पुरुष’ की समाधि बनी हुई है. वहां से गुजरने वाली ट्रेनें रूककर सलामी देती हैं.
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