सिंहस्थः भाजपा के समरसता भोज पर संतों ने उठाए सवाल

भाजपा ने दलितों को रिझाने और इस वर्ग में पैठ बनाने की कोशिशों के तहत मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ का इस्तेमाल करने का दांव खेला है.
भाजपा ने दलितों को रिझाने और इस वर्ग में पैठ बनाने की कोशिशों के तहत मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ का इस्तेमाल करने का दांव खेला है.

भाजपा ने दलितों को रिझाने और इस वर्ग में पैठ बनाने की कोशिशों के तहत मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ का इस्तेमाल करने का दांव खेला है.

  • Agencies
  • Last Updated: May 6, 2016, 12:18 AM IST
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भाजपा ने दलितों को रिझाने और इस वर्ग में पैठ बनाने की कोशिशों के तहत मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ का इस्तेमाल करने का दांव खेला है.

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 11 मई को सामाजिक समरसता भोज व स्नान में हिस्सा लेने वाले हैं. भाजपा के इस आयोजन पर संतों ने सवाल खड़े कर दिए हैं.

उज्जैन में 22 अप्रैल से इस शताब्दी का दूसरा सिंहस्थ शुरू हुआ है, यह 21 मई तक चलेगा. इस आयोजन में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई संगठन सक्रिय हैं. भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रदेश संगठन प्रभारी डा़ॅ विनय सहस्रबुद्धे की ओर से जारी बयान में अमित शाह के सिंहस्थ मेला क्षेत्र में आने का ब्योरा दिया गया.



बताया गया कि प्रवास के दौरान पार्टी अध्यक्ष 11 मई को शंकराचार्य जयंती के पावन अवसर पर शंकराचार्यगण, आचार्यगण, धर्मगुरु तथा आध्यात्मिक गुरुओं और अनुसूचित जाति समुदाय के प्रमुख संतों के साथ महाकुंभ में क्षिप्रा स्नान करेंगे. इसके बाद समस्त अनुसूचित जाति के प्रतिनिधियों व धर्मगुरुओं के साथ सहभोज भी करेंगे.
इस मौके पर स्नान व सहभोज से पहले शाह वाल्मीकि समाज के सभी धर्मगुरुओं व संतों का सम्मान भी करेंगे.

भाजपा के इस आयोजन पर संतों ने सवाल उठाए हैं. शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा है कि अनुसूचित जाति के लोगों को यह क्यों याद दिलाया जा रहा है कि वे इस वर्ग से हैं. गंगा के जल में स्नान के दौरान तो यह भूल ही जाना चाहिए कि कौन किस जाति का है. कौन ऊंच है, कौन नीच है, कौन गरीब है, कौन अमीर है. वहां इस बात का स्मरण कराना भेदभाव पैदा करना है.

वहीं अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी ने कहा कि साधु-संतों की कोई जाति नहीं होती, संत बनने से पहले भले उसकी जाति हो, मगर संत बनने के बाद वह किसी जाति का नहीं होता है, बल्कि समाज का हो जाता है.
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