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श्रद्धां​जलि: 'दूध,जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे' गाते हुए 58 वर्ष की उम्र में चल बसे थे किशोर कुमार

Harendra Nath Thakur | News18 Madhya Pradesh
Updated: October 13, 2019, 9:46 AM IST
श्रद्धां​जलि: 'दूध,जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे' गाते हुए 58 वर्ष की उम्र में चल बसे थे किशोर कुमार
मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे और पले-बढ़े किशोर कुमार की आज 32वीं पुण्यतिथि है. (फाइल फोटो)

किशोर दा (Kishor Kumar) 13 अक्टूबर 1987 को अपने बड़े भाई अशोक कुमार (Ashok Kumar) का जन्मदिन मनाने की तैयारियों में जुटे थे, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. इसी दिन वह इस नश्‍वर दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गए.

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खंडवा. मध्य प्रदेश के खंडवा (Khandwa) में जन्मे और पले-बढ़े किशोर कुमार (Kishore Kumar) की आज 32वीं पुण्यतिथि (Death Anniversary) है. किशोर कुमार का नाम आते ही बॉलीवुड का एक मनमौजी, अल्हड़ किस्म के इंसान की तस्वीर आंखों के सामने खिंच जाती है. शोहरत की बुलंदियां छूने के बावजूद किशोर ताउम्र किशोर ही बने रहे. बिना संगीत की शिक्षा लिए किशोर कुमार बॉलीवुड में एक ध्रुवतारा बनकर उभरे और गीत-संगीत के ब्रह्मांड पर छा गए. किशोर कुमार को आज की पीढ़ी भी उतनी ही दिलचस्पी से सुनती और गुनगुनाती है, जितना 1970-90 के दशक में जवान हुई पीढ़ी उन्‍हें प्‍यार करती थी.

4 अगस्त 1929 को खंडवा में जन्मे थे किशोर कुमार

किशोर कुमार बॉलीवुड का वह सितारा है जो मरकर भी हमारे दिलों में आज भी जिंदा है. बॉलीवुड में अपनी गायकी और अदाकारी से सबको लोहा मानने के लिए मजबूर कर दिया था. आज देश उसी किशोर कुमार की 32वीं पुण्यतिथि मना रहा है. 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के छोटे से शहर खंडवा में एक बंगाली परिवार में जन्मे किशोर कुमार के बचपन का नाम तो आभास कुमार गांगुली रखा गया था, लेकिन इस बात का किसी को आभास नहीं था कि एक दिन यही आभाष अपनी गायकी और अदाकारी के बल पर बॉलीवुड पर राज करेगा.

kishore kumar
किशोर कुमार को आज की पीढ़ी भी उतनी ही दिलचस्पी से सुनती और गुनगुनाती है जितना 1970—90 के दशक में जवान हुई पीढ़ी.


देव आनंद के लिए गया था पहला गाना

आभास खंडवा से भागकर अपने भैया अशोक कुमार (Ashok Kumar) के पास मुंबई चले गए थे. यहां बालीवुड ने उन्हें 'किशोर कुमार' का नाम दिया. शुरुआती दौर में वह महान गायक केएल. सहगल की तरह गाने की कोशिश करते रहे. यही वजह है कि उनकी शुरुआती गानों में सहगल का जबरदस्त प्रभाव दिखता है. वर्ष 1948 में खेमचन्द्र प्रकाश के संगीत निर्देशन में फिल्म जिद्दी के लिए उन्होंने पहली बार देवानंद के लिए गाना गाया. गीत के बोल थे 'मरने की दुआएं क्यूँ मांगू, जीने की तमन्ना कौन करे.'

ताउम्र वह खंडवा में बस जाने की सोचते रहे
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किशोर कुमार के घर की चौकीदारी करने वाले सीताराम उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि किशोर कुमार को अपनी जन्मभूमि खंडवा से इतना लगाव था जो शायद किसी भी कलाकार ने अपनी सरजमीं से नहीं किया होगा. किशोर दा ने खंडवा के जिस घर में बचपन गुजारी, जिन गलियों में घूमे-फिरे उसकी यादें ताउम्र उनका पीछा करती रहीं. यहां तक की बचपन में वो जिस लालाजी के यहाँ जलेबी खाते थे, उस लालाजी की दूकान को भी उन्होंने नही भुलाया. बॉलीवुड में उन्होंने एक नारा भी दिया था 'दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे.'

अशोक कुमार का जन्मदिन मनाने की कर रहे थे तैयारी...

किशोर कुमार ने कई कलाकारों को अपनी आवाज देकर बॉलीवुड में स्थापित किया. किशोर कुमार के लिए बम्बई की बुलंदियां हो या बोस्टन का स्टेज शो वह ताउम्र अपनी जन्मभूमि खंडवा का नाम लेना वो कभी नहीं भूलते थे. वह बंबई में जरूर बस गए, लेकिन उनका दिल हमेशा खंडवा लौट आने का करता रहा. इस बात का जिक्र वह अपने दोस्तों के बीच ताउम्र करते रहे. किशोर दा 13 अक्टूबर 1987 को अपने बड़े भाई अशोक कुमार का जन्मदिन मनाने की तैयारियों में जुटे थे, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था. इसी दिन वह इस नश्‍वर दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गए.

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First published: October 13, 2019, 7:35 AM IST
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