रावण नहीं बल्कि कोई और है यहां 400 साल से बुराई का प्रतीक...!
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रावण नहीं बल्कि कोई और है यहां 400 साल से बुराई का प्रतीक...!
मध्य प्रदेश के खरगोन के भावसार क्षत्रिय समाज मे रावण दहन नही बल्कि भगवान नरसिंह द्वारा हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा मनाने की परम्परा है.

मध्य प्रदेश के खरगोन के भावसार क्षत्रिय समाज मे रावण दहन नही बल्कि भगवान नरसिंह द्वारा हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा मनाने की परम्परा है.

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विजयादशमी पर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानते हुए रावण पर भगवान राम के विजय उपलक्ष्य को मनाया जाता है, लेकिन News18 आपको एक ऐसे उपलक्ष्य के बारे में बता रहा है जहां रावण का वध नहीं बल्कि हिरण्यकश्यप का वध करने की परंपरा है.

मध्य प्रदेश के खरगोन के भावसार क्षत्रिय समाज मे रावण दहन नही बल्कि भगवान नरसिंह द्वारा हिरण्यकश्यप का वध करने के बाद बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा मनाने की परम्परा है.

अनूठी और अति प्राचीन करीब 400 सौ से अधिक वर्षो से चली आ रही परंपरा के दौरान पहले माता काली के खप्पर आयोजन होता है. महानवमी-दशमी पर देर रात से आरम्भ होकर अलसुबह तक चले इस आयोजन को देखने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ता है.



हिरण्यकश्यप वध के पहले कालिका की सवारी
ढोल-मंजीरे की थाप पर निमाड़ी गरबों के बीच आस्था श्रद्धा के बीच पूरा माहौल धार्मिक हो जाता है.
अनूठी परंपरा के दौरान संवादो के बीच भगवान नरसिंह और राजा हिरण्यकश्यप कई बार आमने सामने एक दूसरे को ललकार लगाते हैं. हिरण्यकश्यप के वध के साथ ही भवसार समाज के लोग एक दूसरे के गले मिलकर बुराई पर अच्छी के पर्व दशहरे की शुभकामना बधाई देते हैं.

नवरात्रि और दशहरे को लेकर भवसार समाज में दो दिवसीय अनूठी परम्परा को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है.
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