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आदिवासी महिला समलैंगिक शादी के बाद अब जी रही विधवा का जीवन

आदिवासी महिला समलैंगिक शादी के बाद अब जी रही विधवा का जीवन

खरगोन में एक महिला ऐसी है जो अपनी समलैंगिक साथी की मौत के बाद से विधवा का जीवन जी रही है.

खरगोन में एक महिला ऐसी है जो अपनी समलैंगिक साथी की मौत के बाद से विधवा का जीवन जी रही है.

खरगोन में एक महिला ऐसी है जो अपनी समलैंगिक साथी की मौत के बाद से विधवा का जीवन जी रही है.

  • Pradesh18
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    जहां एक ओर देश में अभी भी समलैंगिक कानून को लेकर दो पक्षों में वैचारिक मतभेद के साथ ही कोर्ट में भी मामला अटका हुआ है, वहीं दूसरी ओर खरगोन में एक महिला ऐसी भी है जो पति की भूमिका निभाने वाली अपनी समलैंगिक साथी की मौत के बाद से विधवा का जीवन जी रही है.

    दरअसल, ये अनोखा मामला है जिले के तहसील मुख्यालय भीकनगांव के एक ग्राम का. यहां भंगड़ीबाई ने 30 साल पहले रंगलीबाई उर्फ रंगलाल से शादी की थी. पांच साल पहले रंगलाल की मृत्यु हो गई. इसके बाद से ही भंगड़ीबाई विधवा का जीवन जी रही है.

    परिवार वालों ने कई बार भंगड़ीबाई को दूसरी शादी कर अपना घर बसाने के लिए कहा लेकिन उसके दिल में आज भी सिर्फ रंगलाल के लिए ही जगह है. वह उसकी यादों के सहारे ही अपनी बाकी जिंदगी गुजारना चाहती है.

    भागकर शादी
    भंगड़ीबाई और रंगलीबाई की मोहब्बत की कहानी भी बिलकुल फिल्मी है, जिसमें समाज और परिवार ने कई मुश्किलें पैदा की लेकिन आखिर जीत प्यार की ही हुई. भंगड़ीबाई के मुताबिक, उनकी मुलाकात तब हुई थी, जब रंगलीबाई अपनी बहन (भंगड़ीबाई की भाभी) से मिलने गई थी.

    यहां रंगलीबाई को भंगड़ीबाई पहली ही नजर में पसंद आ गई. कुछ समय तक दोनों मिले और दोनों के विचार भी मिले. इसके बाद प्यार परवान चढ़ता गया. समाज की रीतियों के विपरीत बने इस रिश्ते को बचाने के लिए रंगलीबाई भंगड़ीबाई को भगाकर अपने गांव ले आई.

    इसके बाद रंगलीबाई ने अपना नाम बदलकर रंगलाल रख लिया और पति की भूमिका में आ गई. इनके इस रिश्ते पर समाज ने आपत्ति जताई तो भंगड़ीबाई के पिता भी उसे जबरदस्ती अपने घर ले गए. लेकिन जो रिश्ता समाज की बंदिशों को तोड़कर ही बना था, उसे समाज की रीति कहां रोक सकती थी. मौका देखते ही भंगड़ीबाई खुद पिता के यहां से भागकर वापस रंगलाल के पास आ गई.

    इस मामले को सुलझाने के लिए आखिरकार फिर से समाज के रीति-रिवाजों का सहारा लेना पड़ा. इसकेे अनुसार रंगलीबाई उर्फ रंगलाल ने भंगड़ीबाई के पिता को दिए 500 रुपए और एक बैल दिया. इसके बाद समाज ने दोनों को साथ रहने की इजाजत दे दी.

    25 साल बिताए साथ
    इसके बाद दोनों ने 25 सालों तक एक-दूसरे का साथ निभाया. पांच साल पहले अचानक रंगलाल की मृत्यु हो गई. इसके बाद भंगड़ीबाई अकेली रह गई. फिलहाल वो अपनी भाभी (बाद में 'ननद' भी) के साथ रह रही है.

    Tags: खरगोन

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