मुरैना लोकसभा सीट: अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे की टिकट काट मैदान में आए ये BJP नेता बचा पाएंगे सीट?

मुरैना सीट पर इस बार बीजेपी के दिग्गज और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर हैं तो दूसरी तरफ सिंधिया के करीबी रामनिवास रावत हैं

News18 Madhya Pradesh
Updated: May 11, 2019, 12:49 PM IST
मुरैना लोकसभा सीट: अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे की टिकट काट मैदान में आए ये BJP नेता बचा पाएंगे सीट?
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Updated: May 11, 2019, 12:49 PM IST
किसी ज़माने में डकैतों के लिए कुख्यात रहा चंबल मध्य प्रदेश की सियासत की जबरदस्त धुरी बन गया है. बीजेपी और कांग्रेस के उम्मीदवार तय होने के बाद लड़ाई दिलचस्प हो गई है. मुरैना सीट पर इस बार बीजेपी के दिग्गज और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर हैं तो दूसरी तरफ सिंधिया के करीबी रामनिवास रावत हैं.

बीजेपी की तरफ से 2014 में मुरैना से अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे अनूप मिश्रा सांसद चुने गए थे. पांच साल तक संसदीय क्षेत्र में सक्रिय न रहने के चलते इलाके में उनका कई बार विरोध हुआ. इसलिए बीजेपी ने इस बार नरेंद्र सिंह तोमर को वहां से मैदान में उतारा है. लोकसभा चुनाव 2019 के छठे चरण में 12 मई को यहां मतदान होगा.



दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों को देखने के बाद इतना तो तय है कि कुछ सीटों पर फाइट टाइट होने जा रही है. राम निवास रावत और नरेंद्र सिंह तोमर के बीच आखिर फाइट टाइट क्यों है ये इस समीकरण से समझा जा सकता है.

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नरेंद्र सिंह तोमर, बीजेपी उम्मीदवार
-नरेंद्र सिंह तोमर 2009 में मुरैना से सांसद बने थे लेकिन 2014 में हुए चुनाव में उन्होंने अपनी सीट बदल ली और ग्वालियर से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे
-2014 में मुरैना से अनूप मिश्रा सांसद चुने गए थे. पांच साल तक संसदीय क्षेत्र में सक्रिय न रहने के चलते इलाके में उनका कई बार विरोध हुआ.-पहले मुरैना सीट छोड़ने और इस बार अनूप मिश्रा की नाराजगी का खामियाजा नरेंद्र सिंह तोमर को उठाना पड़ सकता है
-2018 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी को करारी शिकस्त मिल चुकी है. लोकसभा क्षेत्र में आने वाली 8 विधानसभा में से केवल एक पर बीजेपी को जीत मिली थी.

रामनिवास रावत, कांग्रेस उम्मीदावर
-रामनिवास रावत के लिए भी राह उतनी आसान नहीं है
-विधानसभा चुनाव में हार का सामना कर चुके रावत के सामने केंद्रीय मंत्री के रूप में नरेंद्र सिंह तोमर जैसा बड़ा नाम है
-2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मुरैना में करारी शिकस्त मिली थी और वो तीसरे पायदान पर रही
-ठाकुर-ब्राह्मण के जातीय समीकरण से पार पाना भी राम निवास रावत के लिए चुनौती होगी.
-हालांकि रावत के लिए एक प्लस प्वाइंट ये है कि ग्वालियर चंबल में वो सिंधिया के करीबी नेता माने जाते हैं

मुरैना-श्योपुर संसदीय क्षेत्र में सवर्ण वोटर निर्णायक भूमिका में होते हैं. लेकिन बीते साल एट्रोसिटी एक्ट को लेकर हुए आंदोलन की वजह से बीजेपी को विधानसभा चुनाव में खामियाजा उठाना पड़ा. जातीय समीकरण के हिसाब से देंखे तो संसदीय क्षेत्र में,

दलित मतदाता - करीब पौने तीन लाख
ब्राह्मण मतदाता - करीब दो लाख
क्षत्रिय मतदाता - करीब दो लाख
वैश्य - करीब सवा लाख हैं
मीणा रावत - करीब सवा लाख
मुस्लिम - करीब 80 से 90 हजार के आसपास हैं

चंबल की राजनीति में जातिगत फैक्टर अलग करके नहीं देखा जा सकता है. रामनिवास रावत जहां ओबीसी वर्ग से आते हैं तो वहीं नरेंद्र सिंह तोमर ठाकुर सामान्य वर्ग से आते हैं. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आखिर चंबल की लड़ाई में इस बार बाजी कौन मारेगा.

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