अपनी परंपरा, अपनी रीत : मंडला के धनगांव में एक दिन पहले मना ली जाती है दिवाली

आदिवासी नृत्य सैला में शरीक इलाके के लोग.

धनगांव में सारी दुनिया से अलग एक दिन पहले ही हर त्योहार मना लिया जाता है, वह भी पूरे चाव और उत्साह से. इस साल भी अपने आदिवासी लोक नृत्य सैला के साथ यहां दिवाली एक दिन पहले ही मना ली जाएगी.

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मंडला. देशभर में इस साल दिवाली यानी लक्ष्मी पूजा 14 नवंबर को मनाई जाएगी. लेकिन मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में मंडला (Mandla) जिले में एक ऐसा गांव है, जहां दिवाली तय तिथि से एक दिन पहले ही मना ली जाती है. सिर्फ इसी साल ही नहीं बल्कि, हर साल इस गांव में दिवाली एक दिन पहले मना ली जाती है. इसके पीछे ग्रामीणों की अपनी परंपरा और मान्यता है. यहां एक साथ मिलकर ग्रामीण पूजा करते हैं, दीप जलाते हैं और पटाखे फोड़ने के साथ ही सारा गांव मिलकर अपना आदिवासी नृत्य सैला के साथ खुशियां मनाते हैं.

पूरी दुनिया में दिवाली का त्योहार हिंदी कैलेंडर के मुताबिक कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है, लेकिन मंडला जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर अंदर धनगांव में सारी दुनिया से अलग एक दिन पहले ही हर त्योहार मना लिया जाता है, वह भी पूरे चाव और उत्साह से. इस साल भी अपने आदिवासी लोक नृत्य सैला के साथ यहां दिवाली एक दिन पहले ही मना ली जाएगी. गांव में पीढ़ियों से चली आ रही मान्यता के चलते यहां हर पर्व एक दिन पहले मनाया जाता है. पूरी दुनिया में हर साल कार्तिक अमावस्या को ही दिवाली मनाते हैं, क्योंकि इसी दिन भगवान रामचंद्र लंका विजय कर अयोध्या लौटे थे और दीपों से उनका स्वागत हुआ था, इसलिये यह दीपावली पर्व मनाया जाता है. लेकिन धनगांव की परिपाटी अलग है और अजब भी. यहां दीपावली समय से एक दिन पहले यानी नरक चौदस के दिन मना ली जाती है. यहां के ग्रामीण बताते हैं कि त्योहारों को एक दिन पहले मनाने के पीछे एक किवदंती है, एक मान्यता है. कहते हैं सैकड़ों साल पहले ग्राम देवता खेरदाई माता किसी ग्रामीण के स्वप्न में आए थे. उन्होंने गांव की खुशहाली के लिए ऐसा करने कहा था. तब से हर साल दिवाली, होली, पोला और हरेली तय तारीख से एक दिन पूर्व मनाते हैं. बुजुर्गों और पुरखों के द्वारा बनाई गई इस परंपरा को वे तोड़ना नहीं चाहते. कहते हैं कि जब-जब इसकी कोशिश की गई तो गांव में किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है. इसके अलावा फसलों को नुकसान या पशुओं का नुकसान उन्हें झेलना पड़ता है. कई बार इस परंपरा को तोड़ने के कारण पूरे गांव में बीमारियों का प्रकोप फैल जाता है. इसलिए इस गांव के लोग एक दिन पहले दिवाली मनाते हैं.

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