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MP Election Result 2018: ...तो किसान अपनी उपज का दाम तय क्यों नहीं कर सकता?

MP Election Result 2018 (मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम): एक नौजवान किसान, भरत पाटीदार ने चुप्पी तोड़ी एक सवाल के साथ. उसने सवाल किया कि जब कोई कंपनी, अपने प्रोडक्ट की कीमत खुद तय करती है, तो किसान क्यों अपनी मेहनत और पैदावार की वाजिब कीमत तय नहीं कर सकता.

MP Election Result 2018 (मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम): एक नौजवान किसान, भरत पाटीदार ने चुप्पी तोड़ी एक सवाल के साथ. उसने सवाल किया कि जब कोई कंपनी, अपने प्रोडक्ट की कीमत खुद तय करती है, तो किसान क्यों अपनी मेहनत और पैदावार की वाजिब कीमत तय नहीं कर सकता.

MP Election Result 2018 (मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम): एक नौजवान किसान, भरत पाटीदार ने चुप्पी तोड़ी एक सवाल के साथ. उसने सवाल किया कि जब कोई कंपनी, अपने प्रोडक्ट की कीमत खुद तय करती है, तो किसान क्यों अपनी मेहनत और पैदावार की वाजिब कीमत तय नहीं कर सकता.

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    शिफाली पांडे

    मंदसौर किसान गोली कांड के डेढ साल बीतने के बाद भी बीजेपी किसान को भले मुद्दा मानने से इनकार कर रही हो लेकिन इसी गोलीकांड में मारे गए अभिषेक अगर अपने गांव की पहचान बन चुके हैं. अभिषेक का बरखेड़ा पंथ गांव हाइवे के किनारे बसा है.

    हाइवे से लगा पहला घर अभिषेक का है. यहां की हर दीवार पर उनकी एक तस्वीर है. लेकिन एक तस्वीर ऐसी है जिस पर किसी की भी नज़र ठहर जाए. दरअसल वो चुनावी बैनर है, जिसमें कांग्रेस उम्मीदवार के साथ अभिषेक पाटीदार खड़े हैं.

    असल में मंदसौर विधान सभा क्षेत्र की मौजूदा तस्वीर भी यही है. सियासी दलों के लिए खेत बिसात बन गए हैं और किसान मोहरा. ये गांव मल्हारगढ़ विधान सभा क्षेत्र में आता है. बरखेड़ा पंथ से ही मालवा का वो इलाका शुरू होता है, जिसने डेढ़ साल पहले सीएम शिवराज की मुश्किल बढ़ाईं. माना जा रहा है कि इस बार यहां का खामोश लेकिन नाराज़ किसान चुनाव में बीजेपी की मज़बूत ज़मीन खींच सकता है.

    मंदसौर की मंडी में लहसुन की ज़ोरदार आवक हो रही है. फसल अच्छी हुई है, लेकिन किसान आंदोलन के डेढ़ साल बाद भी, उसकी जु़बान पर वो सवाल बना हुआ है कि फसल का वाजिब दाम कब मिलेगा.नीमच से मंदसौर मंडी में लहसुन बेचने आए किसान भंवर सिंह कहते हैं, लहसुन का दाम 2000 रुपए मिलता था. लेकिन अब वही लहसुन मिट्टी मोल 300 से 400 रुपए क्विंटल में जा रहा है.परेशान किसान भावांतर का तो नाम भी नहीं सुनना चाहता. भंवर एक लाइन में भावांतर की व्याख्या करते हैं, इस योजना से सिर्फ बिचौलियों को फायदा हुआ है.

    चुनाव के एन पहले किसानों को भरमाने के लिए लायी गयी भावांतर योजना क्या चुनाव पर कोई असर डाल पाएगी. मालवा की 66 सीटों पर जीत-हार मध्यप्रदेश की राजनीति पर खासा असर डालती है.मध्यप्रदेश में सत्ता का दरवाजा खोलती हैं. इस दरवाजे की चाभी हमेशा से किसान के हाथ में रहती है. कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि बीजेपी से नाराज किसान दरवाजा उसके हक में खोल सकता है.

    लेकिन हैरत की बात ये है कि किसान मुंह नहीं खोल रहा.वो किसी सियासी दल को अपना समर्थन या विरोध दर्ज नहीं करा रहा.बूढा गांव में एक नौजवान किसान, भरत पाटीदार ने चुप्पी तोड़ी एक सवाल के साथ. उसने सवाल किया कि जब कोई कंपनी, अपने प्रोडक्ट की कीमत खुद तय करती है, तो किसान क्यों अपनी मेहनत और पैदावार की वाजिब कीमत तय नहीं कर सकता. पंद्रह साल में सबकी आमदनी बढ़ गई, लेकिन किसान तो वहीं खड़ा है.

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