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50 years of dacoits surrender how rebels adopted mahatma gandhis path of non violence

दस्यु आत्मसमर्पण के 50 सालः गांधी की राह पर चल पड़े बागी, अब चंबल के बीहड़ों में क्यों नहीं गरजतीं बंदूकें?

मुरैना के जौरा स्थित महात्मा गांधी सेवा आश्रम में डकैतों के आत्मसमर्पण की 50वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

मुरैना के जौरा स्थित महात्मा गांधी सेवा आश्रम में डकैतों के आत्मसमर्पण की 50वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

दस्यु आत्मसमर्पण के 50 सालः चंबल की इसी रेतीली, ऊबड़-खाबड़, खून से सनी जमीन पर आज से ठीक 50 साल पहले यानी 14 अप्रैल 1972 को बागियों के हृदय परिवर्तन और आत्मसमर्पण की ऐसी ऐतिहासिक घटना हुई थी, जिसने चंबल घाटी की तस्वीर बदल कर रख दी. मुरैना के जौरा महात्मा गांधी आश्रम में मलखान सिंह, मोहर सिंह, माधो सिंह, बहादुर सिंह, अजमेर सिंह जैसे खूंखार दस्युओं ने गांधीजी की तस्वीर के सामने अपनी बंदूकें रखकर शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया था. गांधीवादी विचारक स्व. डॉ. एस.एन. सुब्बाराव, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण जैसी महान विभूतियों के अथक प्रयासों से घाटी में शांति का यह ऐतिहासिक पल आया था.

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जौरा (मुरैना). क्या आप जानते हैं कि चंबल के बीहड़ों में अब डकैतों की बंदूकें क्यों नहीं गरजतीं? बीहड़ क्यों खामोश हैं, शांत हैं, आतंक के खौफ से आजाद हैं? क्यों बदले की आग में युवाओं का खून बागी बनकर नहीं खौलता? शायद नहीं, तो हम आपको बता दें कि चंबल की इसी रेतीली, ऊबड़-खाबड़, खून से सनी जमीन पर आज से ठीक 50 साल पहले यानी 14 अप्रैल 1972 को बागियों के हृदय परिवर्तन और आत्मसमर्पण की ऐसी ऐतिहासिक घटना हुई थी, जिसने चंबल घाटी की तस्वीर बदल कर रख दी. मलखान सिंह, मोहर सिंह, माधो सिंह, बहादुर सिंह, अजमेर सिंह जैसे खूंखार दस्युओं ने गांधीजी की तस्वीर के सामने अपनी बंदूकें रखकर शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया था. गांधीवादी विचारक स्व. डॉ. एस.एन. सुब्बाराव, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण जैसी महान विभूतियों के अथक प्रयासों से चंबल घाटी में शांति का यह ऐतिहासिक पल आया था.

उसी ऐतिहासिक पल का स्वर्ण जयंती समारोह आज मुरैना के जौरा स्थित महात्मा गांधी सेवा आश्रम में बेहद उत्सवी माहौल में मनाया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में 1972 में हथियार डालने वाले पूर्व दस्यु और उनके परिजन शामिल हुए हैं. आज कार्यक्रम का उद्घाटन केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने करते हुए पूर्व डकैतों को सम्मानित किया. स्व. सुब्बाराव की सौंपी विरासत को सहेजने और अहिंसक आंदोलनों के माध्यम से वंचितों, आदिवासियों के लिए जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ने वाले एकता परिषद के प्रमुख, सामाजिक कार्यकर्ता पी. वी. राजगोपाल के साथ मंच पर उन पूर्व दस्युओं को भी सम्मान मिला, जिनके नाम और बंदूकों की गरज से चंबल के बीहड़ कांपते थे. जौरा के इस आश्रम में देश भर से आए समाजसेवी, चिंतक, विचारक भी अविस्मरणीय पल के साक्षी बने हैं.

जौरा के इस आश्रम में युवाओं को गांधीवादी विचार, अहिंसा की शक्ति, इतिहास के संघर्षों और मौजूदा मुद्दों से परिचित कराने के लिए युवा महोत्सव भी आयोजित किया गया है, जो 16 अप्रैल तक चलेगा. इसमें देश भर से आए करीब एक हजार युवा जौरा आश्रम में जुटे हैं. इस मौके पर केन्द्रीय मंत्री तोमर ने कहा कि शांति और अहिंसा की ताकत बंदूक में नहीं है. कार्यक्रम में उपस्थित समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने कहा कि चंबल में न्याय और शांति के लिए शिक्षा और रोजगार की प्राथमिकता हो. प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि दंगा फसाद मिटाने का रास्ता गांधीवाद में है.

क्या हुआ था 1972 में जौरा आश्रम में

Tags: Chambal news, Dacoit, Mp news

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