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'बैंडिट क्वीन' नहीं अब चंबल से निकलेंगी मर्दानी

अब उसी चंबल की तस्वीर बदल रही है और डकैतों का आतंक खत्म हो चुका है.
अब उसी चंबल की तस्वीर बदल रही है और डकैतों का आतंक खत्म हो चुका है.

अब उसी चंबल की तस्वीर बदल रही है और डकैतों का आतंक खत्म हो चुका है.

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चंबल के बीहड़ों का नाम आते ही जेहन में एक से बढ़कर एक खूंखार डाकुओं के नाम आने लगते हैं. चंबल में कई ऐसे डाकू हुए जिनके नाम से हर कोई कांप जाता था. लेकिन ऐसी महिलाओं की भी कमी नहीं, जिन्होंने बीहड़ों पर पुरुष डकैतों की तरह ही राज किया. फूलन देवी, सीमा परिहार, पुतली बाई और कुसमा नाइन ऐसी ही महिला डकैत हैं.

अब उसी चंबल की तस्वीर बदल रही है. डकैतों का आतंक खत्म हो चुका है और अब यह रवायत भी खत्म होती दिख रही है, 'जिसने चंबल का पानी पीया वो बागी हो गया.' क्योंकि अब चंबल से महिला डकैत नहीं रियल मर्दानी सामने आ रही है, जिनका लक्ष्य है पुलिस में भर्ती होकर देशसेवा करना.

चंबल में जहां पहले बेटियों को घर की दहलीज पार नहीं करने दिया जाता था, वहीं अब तस्वीर बदल रही है. इस तस्वीर को बदलने बाली कोई और नहीं चम्बल की बेटियां ही हैं. जिन्होंने पुलिस में भर्ती होने की ठानी और हाल ही में पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा की लिखित परीक्षा पास कर अब फिजिकल परीक्षा पास करने के लिए जीतोड़ मेहनत कर अपना पसीना बहाने में लगी हुई है.



मुरैना के भीमराव आंबेडकर स्टेडियम में का तो नजारा ही इन दिनों बदला हुआ नजर आ रहा है. कभी वीरान पड़े रहने वाले इस स्टेडियम में अब सैकड़ों की संख्या में लड़कियां सुबह से लेकर शाम तक 800 मीटर की दौड़ हो या लम्बी कूद या फिर गोला फेक, शारीरिक टेस्ट की हर विधा के लिए खुद को तैयार कर रही है.
दरअसल, मीडिया में महिला पुलिस अफसरों के बहादुरी के किस्से सुनकर धीरे-धीरे चंबल की रवायत बदलने लगी है. पिछले कुछ वर्षों फ़ोर्स भर्ती परीक्षा की कोचिंग चला रहे जोगेंद्र भी इस बार हैरान है कि पिछले कई साल की अपेक्षा इस बार जिले की लड़कियां, लड़को से अधिक पास हुई है.

जोगेंद्र बताते हैं, 'सभी अब फिजिकल परीक्षा की तैयारी कर रही है, जिसमें दौड़ हो या लांग जंप या गोला फेक, ये सभी फिजिकल परीक्षा के पैमाने की कसौटी पर खुद को परख रही है. लड़कियों में पुलिस भर्ती को लेकर जो जुनून इस बार देखा जा रहा है, वो पहले कभी नहीं देखा गया.
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