विस्तारकों ने कही ऐसी बात कि अमित शाह भी सोच में पड़ गए

अमित शाह की फाइल फोटो
अमित शाह की फाइल फोटो

मालवा की 48 सीटों पर एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर साफ़ दिखाई देता है इन 48 में 44 पर भाजपा के विधायक काबिज हैं. इ

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विधान सभा चुनाव का माहौल अब गरमा रहा है. एमपी और राजस्थान में ख़ासी गर्मागर्मी है. इन चुनावों में ख़ास बात ये है कि मध्य प्रदेश में मालवा के चुनावी समीकरण पर पड़ौसी राज्य राजस्थान के मेवाड़ और वागढ़ से प्रभावित होते हैं. इसकी वजह ये है कि मालवा के ज़्यादातर ज़िलों की सीमाएं मेवाड़ और वागढ़ से लगी हैं. चुनाव के दौरान ये सीमाएं दोनों राज्यों की पुलिस के लिए बड़ा सिरदर्द होती हैं.

पिछले एक महिने में मालवा, मेवाड़ और वागढ़ घूमने के बाद ज़मीनी हालात जानें. मालवा की 48 सीटों पर एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर साफ़ दिखाई देता है इन 48 में 44 पर भाजपा के विधायक काबिज हैं. इन 44 विधायकों में मंदसौर के मल्हारगढ़ विधान सभा सीट से भाजपा विधायक और पूर्व काबीना मंत्री जगदीश देवड़ा को छोड़ दें तो अधिकांश बीजेपी विधायकों के ख़िलाफ आम लोगो में जमकर आक्रोश साफ़ दिखाई देता है. हालांकि यहां सीएम शिवराज को आम लोग भला मानते हैं और उनके विरोध की कोई बड़ी वजह फिलहाल वोटर्स को नहीं दिखायी दे रही.

बताया जा रहा है, इसकी ख़बर पार्टी प्रमुख अमित शाह को भी है. हाल ही में जब शाह मालवा दौरे पर आए थे तब इंदौर में उन्होंने पार्टी के विधान सभा विस्तारकों से बात की थी. बताते हैं इन विस्तारकों ने सिटिंग एमएलए के ख़िलाफ जमकर बोला. ये तक कहा अगर इन्हें रिपीट किया गया तो बीजेपी बारह के भाव जाएगी. बताते हैं ये विस्तारक सीधे अमित शाह के लिए काम कर रहे हैं. इसलिए यह साफ़ है कि इनकी राय महत्वपूर्ण है.



जानकार बताते हैं कि इन्हीं विस्तारकों से शाह ने प्रस्तावित दावेदारों के नाम भी लिए हैं. कुल मिलाकर विस्तारकों की रिपोर्ट और सर्वे को अमित शाह टिकिट का आधार बनाएंगे.
अब यदि मेवाड़ की बात करें तो राजस्थान के इस हिस्से में उदयपुर, भीलवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ और प्रतापगढ़ ज़िले आते हैं. यहां लोग सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया से भारी नाराज़ हैं और सिटिंग विधायकों को लेकर भी गुस्सा है. यही हाल वागढ़ का है. वागढ़ क्षेत्र में बांसवाड़ा और डूंगरपुर ज़िले आते हैं. चूंकि राजस्थान से जुड़े इन इलाकों का सीधा सम्पर्क मालवा से है इसलिए वहां की बीजेपी विरोधी लहर मालवा पर भी मार करती है.

कुल मिलाकर इन हालातों के कारण भाजपा को फंक फूंककर कदम रखने की ज़रूरत है. ज़रा-सी चूक मालवा में उसका सफाया कर सकती है. लेकिन उसे सबसे बड़ी राहत इस बात की है कि ज़मीन पर कांग्रेस भी यहां उतनी ताकतवर नहीं है. मालवा में कांग्रेस गुटों में बंटी है. यहां कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह के क्षत्रपों में मारा मारी है तो मेवाड़ और वागढ़ में अशोक गहलोत, सचिन पायलट और सीपी जोशी के समर्थको में तलवारे खिंची हैं. और जैसा हमेशा होता रहा है जिस गुट के नेता को टिकिट मिलता है बाकी गुटों के लोग उसे निपटाने में लग जाते हैं. कांग्रेस की यही गुटबाज़ी भाजपा की जीत का रास्ता साफ कर देती है.

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