#Assembly Election : अन्नदाता उनसे पूछेंगे, आख़िर हमारा क़सूर क्या है

फाइल फोटो
फाइल फोटो

आगामी चुनाव में अफीम और लहसुन एक बड़ा मुद्दा होंगे. किसान नेताओं से इस मामले में सवाल पूछेगा उनसे जवाब तलब करेगा कि आखिर हमार कसूर क्या है. अफीम और लहसुन के कारण मालवा रिच बेल्ट माना जाता था.यहाँ प्रोस्पेरिटी थी. खुशहाली थी.लेकिन अब मायूसी है

  • Share this:
मालवा संघ परिवार की नर्सरी है जहाँ चुनावी चौसर जम चुकी है. इस चौसर पर चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण 'किसान' है जिसे कहते ज़रूर 'अन्नदाता' हैं लेकिन मानता कोई नहीं. आज नीमच मंडी में लहसुन 1 रुपए किलो बिका.

किसान जमकर नाराज़ हुए. वो लहसुन फेंक गए. बोले-इतने कम दाम में तो माल लाने ले जाने का भाड़ा भी नहीं निकल पा रहा.जब लहसुन व्यापारियों से बात की तो बोले सरकार ने जीएसटी लगा दिया. पेट्रोल, डीज़ल के भाव आसमान पर चले गए तो मांग घट गयी. जाहिर है जिंसों के भाव गिरेंगे. जिंसों के भाव गिरने का मतलब किसान गढ्ढे में और किसान गड्ढे में तो देश गढ्ढे में.

मालवा दो फसलों के लिहाज़ से सबसे महत्वपूर्ण है एक तो लहसुन, दूसरा अफीम इस इलाके में किसान अफीम की खेती करता था लेकिन सरकार की पॉलिसी ऐसी आयी की अफीम के पट्टे कम होते चले गए. कभी इस अंचल में एक लाख अफीम परिवार हुआ करते थे. जब अफीम की फसल आती थी तो बाज़ारो की रौनक बढ़ जाती थी. उत्सव होता था. जमकर खरीदारी करते थे लोग. लेकिन अब ऐसा नहीं होता अफीम के घटते पट्टों ने शहर कारोबार की कमर तोड़ दी



अफीम के पट्टे घटने के साथ ही डोडा चूरा की पॉलिसी ने भी किसानों का नुक़सान किया. सरकार ने डोडा चूरा बेचने के बजाय जलाने का फरमान जारी कर दिया. उसके बाद बवाल आया पोस्ता दाना पर जो कभी नगद क्रॉप हुआ करती थी. एक तरफ जहाँ डोडा चूरा पॉलिसी में बदलाव के बाद पोस्ता भूसा नियम विलोपित हो गया तो पोस्ता कारोबारियों को एनडीपीएस का डर सताने लगा. उन्होंने भारतीय पोस्तादाना की खरीदारी बंद कर दी, तो दूसरी तरफ सरकार ने चाइना और टर्की के पोस्ते के लिए भारतीय बाज़ार खोल दिए. जो भारतीय पोस्तादाना 500 से 600 रूपए किलो बिकता था उसकी तुलना में 250 से 300 रूपए किलो का चाइना और टर्की का पोस्ता नीमच, मंदसौर और जावरा मंडियों में आ गया. इस पोस्ते के आयात ने अफीम किसानो की कमर को और तोड़ दिया.
जब अफीम के पट्टे कटे और एनडीपीएस के मामले बेहिसाब बनने लगे तो किसान डाइवर्ट हुआ और उसने लहसुन की खेती को अपनाया. लेकिन अब लहसुन के दाम गिरने लगे. पिछले तीन साल से लहसुन, किसानों को रुला रहा है. किसान को समझ नहीं आ रहा वो क्या करे ,क्या ना करे.

लगता है आगामी चुनाव में अफीम और लहसुन एक बड़ा मुद्दा होंगे. किसान नेताओं से इस मामले में सवाल पूछेगा उनसे जवाब तलब करेगा कि आखिर हमार कसूर क्या है. अफीम और लहसुन के कारण मालवा रिच बेल्ट माना जाता था.यहाँ प्रोस्पेरिटी थी. खुशहाली थी.लेकिन अब मायूसी है

किसान के साथ इन दोनों फसलों से जुड़े व्यापारी भी दुखी हैं. क्योकि जीएसटी, पेट्रोल डीज़ल के ऊँचे दाम, टर्की और चाइना के पोस्ते का आयात, नया पोस्ता भूसा नियम नहीं बनना जैसे अनेक मुद्दे है जिससे नीमच मंडी बेनूर हो गयी. इन हालातो में जब नेता किसानों और व्यापारियों के दरवाज़े जाएंगे तो सवाल तो उठेंगे ही.

ये भी पढ़ें - राहुल इस हफ़्ते आएंगे MP, चित्रकूट में मंदिर दर्शन के बाद शुरू होगा अभियान

मालवा में लहसुन के दाम गिरने से हाहाकार, फसल फेंकने को मजबूर हुए किसान
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज