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वर्ल्ड एड्स डेः साहब! 13 साल से इस धंधे में हूं, आप पहले आदमी हो जिसने यह सवाल पूछा

पिछले 13 साल से इस धंधे में हूं. साहब, आप पहले आदमी हो, जो यह सवाल पूछ रहे हों. पहली बार जब इस दलदल में कदम रखा था, तो ग्राहक से सवाल यहीं होता था कि कंडोम है.
पिछले 13 साल से इस धंधे में हूं. साहब, आप पहले आदमी हो, जो यह सवाल पूछ रहे हों. पहली बार जब इस दलदल में कदम रखा था, तो ग्राहक से सवाल यहीं होता था कि कंडोम है.

पिछले 13 साल से इस धंधे में हूं. साहब, आप पहले आदमी हो, जो यह सवाल पूछ रहे हों. पहली बार जब इस दलदल में कदम रखा था, तो ग्राहक से सवाल यहीं होता था कि कंडोम है.

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पिछले 13 साल से इस धंधे में हूं. साहब, आप पहले आदमी हो, जो यह सवाल पूछ रहे हों. पहली बार जब इस दलदल में कदम रखा था, तो ग्राहक से पहला सवाल यहीं होता था कि कंडोम है. कई ग्राहक घर की दहलीज पर आकर लौट गए. फिर एक दिन एक बड़ा सेठ आया. मेरी जुबां पर वहीं सवाल 'कंडोम', वो सेठ लौट गया, लेकिन उसके बाद जो हुआ वह जिंदगी भर नहीं भूल सकती.

सेठ की शानौ-शौकत देखकर मां-बाप के चेहरे खिल गए थे. उन्हें लगा था कि बेटी के जिस्म से उनकी लॉटरी लग सकती है. ऐसे में सेठ के इस तरह नाराज होकर लौटने का कहर फिर मुझ पर टूटना लाजमी ही था. उस रात जो पिटाई हुई, उसका दर्द आज भी मुझे यह सवाल पूछने से रोक देता है.

33 साल की रोशनी (बदला हुआ नाम) की आंखों में एक अलग ही चमक देखने को मिल रही थी. मध्य प्रदेश के नीमच जिले के जैतपुरा की चंद गलियों में अब तक उसकी दहलीज पर आने वाला हर शख्स उसके जिस्म की बोली लगाता था. पहली बार कोई उसके वजूद की बात कर रहा था, तो उसने अपनी जिंदगी का सारा फलसफा किसी खुली किताब की तरह खोलकर रख दिया.



रोशनी, जिसकी जिंदगी में उम्मीदों का दीया 19 साल की उम्र में ही बुझ गया, जब पहली बार उसे मां-बाप ने पैसे के एवज में एक शख्स के साथ हम-बिस्तर होने के लिए बोला था. बाछड़ा समुदाय के लिए यह कोई नयी बात नहीं थी, लेकिन रोशनी ने इस दलदल से बाहर निकलने के सपने देखे थे, लेकिन परंपराओं के नाम पर उसके सारे सपनों को 10 बाय 10 के कमरे में कैद कर रख दिया गया.
अब उसका जिस्म परिवार के लिए घर खर्च था, लेकिन जिस्म के साथ रूह के रौंदे जाने का अहसास सिर्फ रोशनी ही महसूस कर सकती थी. रोशनी बताती हैं कि एक दिन उसके बचपन की सहेली की मौत हो गई. वो भी उसकी तरह जिस्मफरोशी के बाजार का हिस्सा थी. उस दिन पहली बार रोशनी को लगा कि मौत का दूसरा नाम एचआईवी एड्स है.

अब तक खुलकर बात कर रही रोशनी के चेहरे पर मौत की रंगत बदलती जा रही थी. चेहरे पर अब मौत का डर आसानी से पढ़ा जा सकता था. खुद के सारे दर्द को समेटते हुए रोशनी एक फीकी मुस्कान लिए कहती है, 'साहब, प्रेग्नेंट ना हो इसका तो सारा इंतजाम हम कर सकते हैं, लेकिन सुरक्षित सेक्स में हमारी मर्जी कहां चलती है. यह तो ग्राहक पर निर्भर करता है. हमारी जिंदगी तो यूं ही नर्क है, लेकिन कई बार उस अनजान शख्स के लिए लगता है कि वो अपनी जिंदगी को खतरे में डाल रहा है.'

रोशनी बताती हैं कि कुछ स्वयंसेवी संगठन समय-समय पर आकर जागरूक करते हैं, लेकिन हमारी बात तो कोई सुनें. यदाकदा ही कोई शख्स सुरक्षित साधनों का प्रयोग करता है, तो यह हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं होता.'

तभी दरवाजे पर आहट हुई. रोशनी समझ गई कि थी कि कौन आया होगा...

बेटी की जिस्मफरोशी से चलता है घर

नीमच जिलेे में बांछड़ा समुदाय के 25 गांव हैं. इन गांवों में 19 गांव में परंपराओं के नाम पर बेटियों से जिस्मफरोशी कराई जाती है. यहां जिस्मफरोशी को बुरा नहीं माना जाता है.

-नीमच जिले में एड्स एक महामारी का रूप लेता जा रहा है. जिले मे दो वर्ष में 56 मौते एड्स के कारण दर्ज की गई.
-42 गर्भवती महिलाओं और 61 बच्चों में एचआईवी संक्रमण पाया गया.
-वर्ष 2013-2014 में 25 मौतें एड्स की वजह से हुईं.
-2014-2015 में ये आंकड़ा बढ़कर हो गया 31 हो गया.

 
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