41 बंधुआ मजदूर पहुंचे अपने घर, काम नहीं मिलने से पलायन को मजबूर सैकड़ों परिवार

पन्ना जिले के बंधुआ मजदूर अपने घर पहुंच कर बेहद खुश हैं.

पन्ना जिले के बंधुआ मजदूर अपने घर पहुंच कर बेहद खुश हैं.

मध्य प्रदेश के 41 मजदूर सोलापुर में बंधक थे. प्रशासन ने इनको मुक्त करा लिया. काम न मिलने की वजह से मजदूरों का पन्ना जिले से पलायन रुक नहीं रहा. प्रशासन ने इससे पहले 91 बंधुआ मजदूर मुक्त कराए थे.

  • Last Updated: March 21, 2021, 10:30 AM IST
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पन्ना. आज भी बंधुआ मजदूर समाज में मौजूद हैं. सरकार रोजगार के कितने ही दावे कर ले, वास्तविकता उसके उलट ही नजर आ रही है. इसका जीता-जागता है उदाहरण ये खबर है. मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के 41 मजदूर महाराष्ट्र के सोलापुर में बंधक बना लिए गए थे. इन 41 मजदूरों को प्रशासन ने मुक्त करा लिया है. ये सभी मजदूर लौटकर मध्य प्रदेश के पन्ना में अपने घर पहुंचे. इन मजदूरों की दुर्दशा देखकर सरकार की मनरेगा योजना पर भी सवाल खड़े हो गए हैं.

कलेक्टर संजय कुमार मिश्रा और एसपी धर्मराज मीणा की मौजूदगी में 41 मजदूरों का जत्था शनिवार को पन्ना पहुंचा. ये सभी मजदूर साकरिया ग्राम पंचायत के हैं और मजदूरी करने के लिए महाराष्ट्र के सोलापुर गए थे. इन मजदूरों को ठेकेदार के माध्यम से वहां भेजा गया था. मजदूरों ने बताया कि 1 माह से अधिक काम करने के बाद भी न तो इनको मजदूरी मिली और न ही उनके खाने की व्यवस्था की गई. किसी तरह प्रशासन को इसकी जानकारी मिली तो इनको वहां से छुड़ाया गया. कई मजदूरों ने आरोप लगाए कि ठेकेदार ने उनके साथ मारपीट की है.

नहीं मिल रहा काम, रुक नहीं पलायन

गौरतलब है कि श्रम मंत्री के जिले में ही मजदूरों को कोई भी काम नहीं मिल रहा. बंधुआ मजदूरों की मुक्ति से प्रशासन के दावों की पूरी पोल खोल गई. वास्तविकता यह है कि इन मजदूरों को बहला-फुसलाकर लोग ले जाते हैं. यहां मजदूरों के पलायन का सिलसिला रुक ही नहीं रहा. भले ही सरकार मनरेगा जैसी योजना चलाकर हर मजदूर को काम देने की बात कर रही हो लेकिन स्थिति इसके उलट है.
हाल ही में छुड़ाए थे 91 बंधुआ मजदूर

बता दें, पन्ना में कुछ दिन पहले ही 91 बंधुआ मजदूरों को छुड़ाकर प्रशासन ने वाहवाही लूटी थी. और अब इन 41 मजदूरों को छुड़ाकर इनके घर भेजा जा रहा है. कलेक्टर ने कहा कि यह मजदूर महाराष्ट्र से आए थे इसलिए इनकी कोरोना की जांच भी की जा रही है. गौरतलब है कि सैकड़ों परिवार ऐसे हैं, जो रोज पलायन को मजबूर हैं.
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