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एमपी के आईपीएस अफसर से वीरता पदक छीना, 15 साल पुराना एनकाउंटर बना वजह

Photo-Facebook
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राष्ट्रपति ने मध्य प्रदेश के आईपीएस अफसर और रतलाम रेंज में बतौर डीआईजी पदस्थ धर्मेंद्र चौधरी से वीरता पदक वापस ले लिया है. डीआईजी को एक कुख्यात बदमाश के एनकाउंटर पर वीरता पदक दिया गया था.

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राष्ट्रपति ने मध्य प्रदेश के आईपीएस अफसर और रतलाम रेंज में डीआईजी पद पर पदस्थ धर्मेंद्र चौधरी से वीरता पदक वापस ले लिया है. डीआईजी को एक कुख्यात बदमाश के एनकाउंटर पर वीरता पदक दिया गया था.

धर्मेंद्र चौधरी ने वर्ष 2002 में झाबुआ में पदस्थ रहने के दौरान कुख्यात बदमाश लोहान को एनकाउंटर में मार गिराया था. मध्य प्रदेश के गुजरात और राजस्थान पुलिस को भी इस कुख्यात बदमाश की तलाश थी. उस पर तीनों राज्यों में कुल 14 संगीन मामले दर्ज थे.

धर्मेंद्र चौधरी को इस बहादुरी के लिए राष्ट्रपति की तरफ से वर्ष 2004 में  वीरता पदक से सम्मानित किया गया था.



एनकाउंटर के करीब छह साल बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में संज्ञान लिया. आयोग ने अपनी जांच में इस एनकाउंटर को सही नहीं माना था, जिसके बाद राष्ट्रपति सचिवालय ने 30 सितंबर को पदक वापसी की अधिसूचना जारी कर दी.
रतलाम डीआईजी ने न्यूज18 से बातचीत में कहा कि उन्हें  पदक वापस किए जाने की जानकारी नहीं है. धर्मेंद्र चौधरी ने कहा अभी राष्ट्रपति सचिवालय से जारी आदेश नहीं मिला है.

उन्होंने कहा कि यदि पुलिस मुख्यालय इस बारे में उनसे कोई जवाब मांगेगा, तो वे अपना पक्ष रखेंगे. राज्य सरकार ने इस एनकाउंटर को सही बताया था.

दरअसल 5 दिसंबर 2002 में हुए इस एनकाउंटर की जानकारी 2008 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास पहुंची थी.

-आयोग ने एनकाउंटर का परीक्षण कर कुछ बिन्दुओं पर गलतियां निकाली और इस मामले में कार्रवाई के लिए प्रदेश सरकार को पत्र लिखा.
-साथ ही पुलिस अधिकारी धर्मेंद्र चौधरी को दिए अवॉर्ड पर सवाल उठाए गए थे.
-हालांकि, राज्य सरकार की तरफ से दिए जवाब में एनकाउंटर को सही बताया गया था.
-सरकार की तरफ से कहा गया था कि इस पर पुनर्विचार करने की जरुरत नहीं है.
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