रतलाम नगर निगम के इस पद पर नहीं बैठना चाहता कोई, नेता इस वजह से मानते हैं अशुभ

रतलाम नगर निगम

रतलाम नगर निगम

सत्ता के गलियारों में इस बात की चर्चा होती है कि जो भी नेता रतलाम नगर निगम (Ratlam Municipal Corporation) की इस कुर्सी पर बैठता है उसकी राजनीति पर फुल स्टॉप लग जाता है. ऐसा एक बार नहीं बल्कि चार बार हुआ है, यही वजह है की रतलाम के नेता इस पद को शुभ नहीं मानते

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 6, 2020, 9:12 PM IST
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रतलाम. मध्य प्रदेश के रतलाम में नगर सरकार चुनने की (Ratlam Municipal Corporation Election) सुगबुगाहट शुरू हो गईं है. रतलाम नगर निगम का चुनाव वर्ष 2019 में होना था मगर ऐसा हो न सका, अब इसके वर्ष 2021 में होने की संभावना है. निगम चुनाव को लेकर रतलाम (Ratlam) के नेताओं की बांछे खिलने लगी हैं. मगर रतलाम नगर निगम में एक पद ऐसा भी है जिस पर काबिज होने के लिए शायद ही कोई नेता तैयार हो. दरअसल रतलाम नगर निगम की इस कुर्सी को लोग अशुभ मानते हैं.

सत्ता के गलियारों में इस बात की चर्चा होती है कि जो भी नेता रतलाम नगर निगम की इस कुर्सी पर बैठता है उसकी राजनीति पर फुल स्टॉप लग जाता है. ऐसा एक बार नहीं बल्कि चार बार हुआ है, यही वजह है की रतलाम के नेता इस पद को शुभ नहीं मानते. यह रतलाम नगर निगम के अध्यक्ष पद की कुर्सी है जिसे स्थानीय राजनीति में अशुभ माना जाता है. वर्ष 1994 में रतलाम नगर निगम के बनने के बाद से अब तक पांच परिषदों का गठन हुआ है. यहां पांच महापौर और पांच अध्यक्ष चुने गए. महापौर तो विधायक भी बन गए लेकिन निगम अध्यक्ष बनने के बाद चारों नेता कुछ खास कमाल नहीं कर पाए और सक्रिय राजनीति में हाशिए पर चले गए.

वर्ष 1994 में निर्वाचित पहली परिषद् में सतीश पुरोहित, दूसरी परिषद् में सुरेश जाट अध्यक्ष बने लेकिन अध्यक्षीय कार्यकाल के बाद यह दोनों सक्रिय राजनीति में कुछ खास कमाल नहीं कर पाए. वहीं वर्ष 2004 में तीसरी परिषद् में विष्णु त्रिपाठी अध्यक्ष बने, इसके बाद वो विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बने लेकिन पिछले दिनों कोरोना वायरस संक्रमण से उनका निधन हो गया. वर्ष 2008 में दिनेश पोरवाल चौथी परिषद् में अध्यक्ष बने लेकिन अगला नगर निगम चुनाव वो हार गए. वर्ष 2014 में अशोक पोरवाल नगर निगम के अध्यक्ष बने. पिछले साल उनका कार्यकाल पूरा हुआ है. इस बाबत अब वो बरसों से चले आ रहे इस मिथक को झुठलाते हैं.

लगातार चार अध्यक्षों की राजनीति का ग्राफ गिरने की वजह से यह धारणा आम हो गई की यह कुर्सी अशुभ है. रतलाम की राजनीति के पंडित पारस सकलेचा भी इस बात पर मुहर लगाते हैं कि इस सीट पर श्राप है. उनका मानना है कि इस सीट पर बैठने के बाद नेताओं का जुझारूपन खत्म हो जाता है. हालांकि वो इस फॉर्मूले को विधानसभा और लोकसभा चुनाव पर भी लागू कर रहे हैं.
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