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400 साल से मशहूर है रोन व कुमरई कुत्ते कुतिया की कथा,बनी है समाधि

 रोन व कुमरई कुत्ते कुतिया की समाधि

रोन व कुमरई कुत्ते कुतिया की समाधि

मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड में एक नहीं बल्कि दो गांव ऐसे हैं, जहां कुत्तों का भी सम्मान है.इन गांवों के बीचोंबीच एक समाधि है जो कुत्ता ओर कुतिया की हैं.मध्य प्रदेश के सागर में कुत्ते के अर्थ बदल जाते हैं.दरअसल इस जिले की गढ़ाकोटा तहसील में दो गांव रोन ओर कुमरई की कहावत यानि लोककथा 400 सौ सालों इस अंचल में जारी है.यहां दो कुत्ते-कुतिया की समाधि बनी है, जिसको लोग बड़ी श्रद्धा से देखते हैं.

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बहुत अजीब सी विरोधाभासी बात है कि सदियों से वफादार जानवर कुत्ता का नाम एक गाली के रूप में इस्तेमाल होता है. लेकिन मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड में एक नहीं बल्कि दो गांव ऐसे हैं, जहां कुत्तों का भी सम्मान है.इन गांवों के बीचोंबीच एक समाधि है जो कुत्ता ओर कुतिया की हैं.मध्य प्रदेश के सागर में कुत्ते के अर्थ बदल जाते हैं.दरअसल इस जिले की गढ़ाकोटा तहसील में दो गांव रोन ओर कुमरई की कहावत यानि लोककथा 400 सौ सालों इस  अंचल में जारी है.यहां दो कुत्ते-कुतिया की समाधि बनी है, जिसको लोग बड़ी श्रद्धा से देखते हैं.

लोग बताते हैं कि सदियों पहले इन दोनों गांवों में अलग-अलग भोज हुआ.भोज रोन गांव में भी था और कुमरई गांव में लेकिन एक वक्त पर था.रोन की भोज पंगत में लेटलतीफी देख कुत्ता ओर उसके साथ कुतिया ने कमरई गांव में हो रही भोज पंगत में दावत करने की सोची.जब वह दोनों वहां पहुंचे तो यहां भी खाना शुरू होने में कुछ वक्त था.तब इन दोनों जानवरो ने वापस रोन गांव का रुख किया लेकिन यहां पंगत खत्म हो चुकी थी और झूठी पत्तलों को स्थानीय कुतों ने चाट चाट भोजन खत्म कर दिया था.हताश हुए यह दोनों कुत्ता कुतिया वापस कमरई आए लेकिन उन्हें  यहां भी वही  देखने को मिला.यहां भी पंगत की झूठी पत्तल खत्म हो चुकी थी.

दो गांवों के बीच भागदौड़ के बाद भी भोजन ना मिलने के कारण भूख से तड़प-तड़पकर इनका दोनों का दम निकल गया.तभी से यहां एक शिलालेख इस कथा का लगा था जिस पर 400 साल पुरानी यह कहानी संस्कृत में लिखी थी. इसी शिलालेख के स्थान पर अब इन कुत्ता कुतियों की समाधि हैं, जिन्हें लोग सम्मान की निगाह से देखते हैं. इन समाधियों पर कोई जूते पहन कर नहीं चढ़ता है . तब से लेकर इस अंचल में यही कहावत कही जाती है कि " रोन-कुमरई के कुत्ते-कुतिया ".यहां इस कहावत के मायने सब्र ओर धैर्य को लेकर हैं,लालच को लेकर नहीं.

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