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गांधी@150 स्पेशल: MP के इस गांव में बापू के चरखे से चलती है लोगों की रोजी-रोटी

News18 Madhya Pradesh
Updated: October 2, 2019, 9:29 PM IST
गांधी@150 स्पेशल: MP के इस गांव में बापू के चरखे से चलती है लोगों की रोजी-रोटी
बापू का चरखा पाल समाज के जीवन यापन का साधन बना.

महात्‍मा गांधी (Mahatma Gandhi) की 150वीं जयंती (150th Birth Anniversary) को धूमधाम से मनाया जा रहा है. जबकि सतना जिले (Satna District) का एक गांव ऐसा भी है जहां के लोग बापू को अपना आदर्श मानकर उनके पद चिन्हों पर वर्षों से चल रहे हैं. जी हां, सुलखमा गांव में आज भी घरों में गांधी जी का चरखा चलता है.

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सतना. आज महात्‍मा गांधी (Mahatma Gandhi) की 150वीं जयंती (150th Birth Anniversary) को धूमधाम से मनाया जा रहा है. सच कहा जाए तो हर कोई गांधीजी के बताए रास्‍ते पर चलने की शपथ लेने के अलावा उनके आदर्शों की चर्चा करता है, लेकिन कुछ समय बाद भूल जाता है. हालांकि सतना जिले (Satna District) का एक गांव ऐसा भी है जहां के लोग बापू को अपना आदर्श मानकर उनके पद चिन्हों पर वर्षों से चल रहे हैं. जी हां, सुलखमा गांव में आज भी घरों में गांधी जी का चरखा चलता है और लोग इसे परंपरागत रूप से आत्मसात कर चुके हैं. ये चरखा ही उनकी रोजी रोटी का सहारा है. हालांकि आधुनिक दौर में यहां के लोग विकास में पिछड़ चुके हैं, इसके बाबजूद चरखा का मोह नहीं छोड़ रहे हैं.

चरखा के मोह से हुआ नुकसान
मध्य प्रदेश के सतना जिला मुख्यालय से 90 किलोमीटर दूर है सुलखमा गांव. आजादी के 72 साल बाद भी इस गांव के बाशिंद विकास की मुख्य धारा से अलग थलग हैं. इस गांव में पाल समाज के लोगों की बहुलता है. गांव के लोग विकास के आधुनिक दौर में भले ही पिछड़े गए हों, लेकिन हर घर के बच्चे से लेकर बड़े-बुजुर्ग तक गांधीजी के बताए रास्‍ते पर चल रहे हैं. कुटीर उद्दोग के रूप में चरखा ही इनकी रोजी रोटी का एक मात्र सहारा है. वह भेड़ पालन कर उसके बाल निकालते हैं और फिर सूत बनाकर हाथ से कंबल बुनते हैं. बगैर कोई सरकारी मदद के बापू का चरखा हर घर में चलता है. महिलाएं सूत कातती हैं और पुरूष कपड़े बनाते हैं. हालांकि लागत के अनुसार कीमत नहीं मिल पाती है.

बापू की धरोहर चरखा जहां देश के संग्रहालयों में देखने की विषय वस्तु बन चुका है तो वहीं सुलखमा गांव में यह लोगों के जीवन यापन का जरिया है


प्रशासन ने शुरू किया ये काम
बापू की धरोहर चरखा जहां देश के संग्रहालयों में देखने की विषय वस्तु बन चुका है तो वहीं सुलखमा गांव में यह लोगों के जीवन यापन का जरिया है. ऐसे में सतना जिला प्रशासन ने इस गांव के लोगों के जीवन में बदलाव लाने की शुरूआत की है. हाल ही में एसडीएम सहित जिला प्रशासन के अधिकारियों ने गांव का दौरा किया और समस्याओं से रूबरू हुआ. जिला कलेक्टर की मानें तो पाल समाज के इस हुनर को तरासा जाएगा. उनकी जरूरत की पूर्ति के लिए प्रयास होंगे और उनकी मांगों के अनुसार उन्हें आधुनिक किया जएगा. इसके अलावा स्थानीय मार्केट भी उपलब्ध कराने के प्रयास होंगे.

गांवों के लोगों ने मानी ये बात
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बहरहाल, सुखलमा गांव के लोग गांधीजी की पहचान चरखा को अपनी धरोहर मान चुके और यही स्वरोजगार का साधन है, लेकिन आधुनिक बाजार में अब इनकी मेहनत और कला के कद्र दान कम ही मिल रहे हैं. आज गांधी जयंती पर इस गांव में कार्यक्रम का आयोजन हुआ. बच्चों ने प्रभातफेरी निकाल बापू को याद किया तो वहीं ग्राम सभा में हुनरमंदों को सम्मानित किया गया.
(रिपोर्ट-शिवेंद्र सिंह बघेल)


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First published: October 2, 2019, 9:05 PM IST
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