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सतना का गांधीवादी गांव सुलखमां, जहां आज भी चलता है बापू का चरखा, इसी से पलते हैं 100 परिवार

सतना का एक गांव गांधीवादी विचारधारा पर चलता है.

सतना का एक गांव गांधीवादी विचारधारा पर चलता है.

महात्मा गांधी के आदर्शों में चलने वाला मध्य प्रदेश के सतना जिले का एक ऐसा गांव जिसे गांधीवादी गांव के नाम से आज भी जाना ...अधिक पढ़ें

    प्रदीप कश्यप/सतना. मध्य प्रदेश के सतना में एक ऐसा गांव है, जहां दावा किया जाता है कि आज भी वहां महात्मा गांधी के आदर्शों पर लोग चलते हैं. जिला मुख्यालय से महज 90 किलोमीटर दूर एक ऐसा गांधीवादी गांव जहां आज भी लोग महात्मा गांधी बापू के आदर्शो पर चल रहे हैं. इस गांव के निवासी आज भी महात्मा गांधी के द्वारा चलाए जाने वाले चरखे को उनकी याद में आज भी चला रहे हैं. इसी चरखे से अपना गुजर-बसर कर रहे हैं. जिस दिन चरखा नहीं चलता उस दिन ग्रामीणों के घरों का चूल्हा नहीं जलता.

    ग्रामीणों की यह अलग पहचान महात्मा गांधी के प्रति उनका लगाओ आज भी दिखाई देता है. सुलखमां गांव में पाल परिवार के करीब सवा 100 घरों में महात्मा गांधी बापू के चरखे के खटर- खटर की आवाज सुनाई देती है. यहां पाल परिवार के लोगों के घरों में भेड़ पालन किया जाता है, और भेड़ों के बाल को निकालकर चरखे के उपयोग से कमल और टाट पट्टी बनाया जाता है. इसे लोग मोहनदास करमचंद गांधी के नाम से जानते हैं, उन्हीं महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलने वाला यह गांव अपने आप में अलग पहचान को दर्शाता है, 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती मनाई जाती है, और गांधी के आदर्शों में चलने वाले इस गांव के बारे में न्यूज 18 के द्वारा जानिए इस गांव की कहानी.

    महात्मा गांधी ने चरखे की शुरुआत कब की थी?
    महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था, महात्मा गांधी के जन्मदिन को गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है, जबकि दुनिया इस दिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाती है, महात्मा गांधी को सन 1908 में इस चरखे की बात सूझी थी, तब वह इंग्लैंड में थे, सन 1916 में साबरमती आश्रम की स्थापना के उपरांत महात्मा गांधी ने चरखा चलाना शुरू किया था, जो आजादी की लड़ाई के साथ ही आर्थिक स्वावलंबन का प्रतीक बन गया था, लेकिन अब यह चरका देश के ज्यादातर संग्रहालय में सिर्फ प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह गया है, जबकि इस चरखे की खटर-खटर की आवाज सतना जिले के करीब सवा सौ परिवारों की 2 जून की रोटी मयस्सर होती है.

    चरखे से कंबल और टाट पट्टी कैसे तैयार की जाती हैं?
    सुलखमां गांव में आज भी सवा सौ परिवार महात्मा गांधी के चरखे को सजोये हुए हुए हैं, ग्रामीणों की माने तो इस चरखे से कंबल, टाट पट्टी बैठकी जैसी चीजें बनाई जाती हैं. एक कंबल को बनाने में करीब 10 दिनों का समय लग जाता है. इसकी लागत 300 रुपए तक आती है. जब कंबल तैयार होता है तो इसे बाजार में 500 रुपए तक बाजार में बेचा जाता है. करीब एक माह में 2 से 3 कंबल का तैयार हो पाते है, कंबल को तैयार करने के लिए सबसे पहले भेड़ो के बाल को काटते हैं, उसके बाद उसकी धुनाई करते हैं, धुलाई के बाद माड़ी लगाते हैं, और उसे सुखाते हैं, इसके बाद चरखे से उसका सूत बनाते हैं, सूत के बाद कंबल और टाट पट्टी तैयार किया जाता है, इस तरीके से ग्रामीण महात्मा गांधी के चरखे से आज भी कंबल और टाट पट्टी बनाने का कार्य कर रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि उनके बड़े बुजुर्ग यह कार्य करते चले आ रहे हैं और आज भी लोग इस कार्य को कर रहे हैं।.

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