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सतना जिले के आदिवासी इलाकों में बूंद-बूंद पानी को तरसे लोग

पानी की तलाश में घरों से निकले आदिवासी

पानी की तलाश में घरों से निकले आदिवासी

सतना जिले के अधिकांश आदिवासी इलाकों में गर्मी के मौसम में लोग पानी की एक-एक बूंद-बूंद को लोग तरस जाते हैं. वैसे तो इन आदिवासी गांवों में 12 महीने पानी की समस्या रहती है लेकिन गर्मी में समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है.

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"रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून । पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून !"  कबीर हों या रहीम, यह तमाम की रचनाओं में सामाजिक चिंतन के साथ दूरदृष्टि भी थी. उनको मालूम था कि पानी का कितना महत्व है और मनुष्य को इसे कितना सहज कर- संभाल कर रखना चाहिए. सतना जिले के अधिकांश आदिवासी इलाकों में लोग गर्मी के मौसम में पानी की बूंद-बूंद को तरस जाते हैं. वहीं सरकार की योजनाएं केवल कागजों में हैं.

सतना जिले के मंझगवां तहसील में प्राचीन काल से जंगलों के बीचोंबीच जीवन यापन करते वाले आदिवासी मवासी जाति के लोग हर बार गर्मियों में पानी की समस्या को किसी जंग से कम मानते हैं. यहां के पांच गांव के ग्रामीण पानी के लिए पांच किलोमीटर पहाड़ के एक झरने में निर्भर रहते हैं. इस समस्या को लेकर कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रदेश सरकार पर सोशल मीडिया में तंज भी कसा है.लेकिन सवाल यह है कि आदिवासियों के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार की करोड़ों की योजना कहाँ हैं.

सतना जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर और मंझगवां तहसील से महज 20 किलोमीटर आदिवासी गांव रामनगर खोखला, पड़ोधारी, पड़ोऊपर, पड़मनिया और मलगौसा गांव के मवासी जाति के लोग भीषण गर्मी में बूंद बूंद पानी को तरसते हैं. इन गरीब आदिवासियों का दर्द से बेखबर लोकतांत्रिक सरकारें आदिवासियों के नाम पर बनती बिगड़ती रही हैं लेकिन यहां के आदिवासियों की तकदीर और तस्वीर जस की तस है.

ग्रामीण आदिवासी पांच किलोमीटर दूर एक झरने गड्ढे का प्रदूषित पानी पीते हैं जिससे हर साल कई लोगों की मौत हो जाती है.भीषण गर्मी में आदिवासी सुबह से लेकर शाम तक केवल एक ही काम बस  में व्यस्त रहते है, वो है पानी का जुगाड़. कुपोषण यहां की विकराल समस्या हो चुकी है और उसका कारण दूषित पानी ही है. पूरे क्षेत्र में हेंडपंप, कुआं या पानी का कोई अन्य साधन मुहैय्या नहीं है.

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