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साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल: मुस्लिम, सिख और ईसाई युवकों ने बचाई जगन्‍नाथ की जान

सभी मददगारों को बुजुर्ग के परिजनों ने माला पहनाकर दिया धन्यवाद

सभी मददगारों को बुजुर्ग के परिजनों ने माला पहनाकर दिया धन्यवाद

मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के शुजालपुर में साम्प्रदायिक सौहार्द (communal harmony) की एक मिसाल पेश की गई. 90 वर्षीय जगन्‍नाथ की जान मुस्लिम, सिख और ईसाई युवकों (Muslim, Sikh and Christian youths) ने मिलकर बचाई.

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शाजापुर. राम मंदिर पर फैसले दिन तमाम तरह की आशंकाओं के बीच शाजापुर के शुजालपुर में साम्प्रदायिक सौहार्द  (communal harmony) की एक मिसाल पेश की गई. इसमें एक हिन्‍दू मरीज के लिए मुस्लिम, सिख और ईसाई सम्‍प्रदाय के चार युवकों (Muslim, Sikh and Christian youths) ने खून देकर उसकी जान बचाई और मानवता को मंदिर-मस्जिद विवाद से बड़ा कर दिखा दिया. जिले के शुजालपुर में डेंगू होने के बाद चितोड़ा गांव के रहने वाले 90 वर्षीय जगन्‍नाथ कुशवाह को उनके परिजन निजी अस्‍पताल में लेकर पहुंचे. जांच में डेंगू की पुष्टि होने के साथ ही डॉक्टर ने परिजनों को बताया कि रोगी के प्‍लेटलेट्स तेजी से कम हो रहे हैं और उन्‍हे तत्‍काल ए पॉजिटिव ब्लड चढ़ाने के साथ ही इलाज शुरू करना होगा.

करीब 100 लोगों के परिवार के मुखिया को खून देने नहीं पहुंचा परिवार को कोई 

छह बेटों और चार बेटियों के साथ करीब 100 लोगों के परिवार के इस उम्रदराज मुखिया जगन्‍नाथ को खून देने के लिए उस समय परिवार का कोई सदस्‍य अस्पताल नहीं पहुंच सका. इसके बाद रक्‍तदान के लिए समाजसेवी अभिषेक सक्सेना ने सोशल मीडिया पर मैसेज जारी किया.

सबसे पहले पहुंचे रईस खां,  जसमीत और  सोनू मसीह भी पहुंच गए अस्पताल

जिसे देख सबसे पहले अस्‍पताल में अकोदिया नाका निवासी रईस खां व सिटी निवासी खलील खां पहुंचे और रक्‍तदान के लिए परिजनों से मिले. रक्‍तदान से पहले इनकी जांच चल ही रही थी कि तभी गुरुनानक जयंती के लिए बाजार में खरीदारी कर रहे जसमीत राजपाल मैसेज देखकर सीधे अस्‍पताल पहुंचे. इसके बाद अकोदिया नाका निवासी सोनू मसीह ने भी पहुंचकर रक्‍तदान किया. मुस्लिम सिख और ईसाई समुदाय के युवाओं के इस जज़्बे प्रभावित होकर परिजनों ने माला पहनाकर मददगारों का धन्‍यवाद दिया.

युवकों के ब्लड डोनेशन के पीछे की कहानी है और दिलचस्प 

अलग-अलग मज़हब से ताल्लुक़ रखने वाले इन युवकों के ब्लड डोनेशन के पीछे छिपे इस जज़्बे की कहानी और भी दिलचस्प है. जसमीत ने गुरू नानक जयंती पर खून की जरूरत का जब मैसेज देखा तो इसे गुरु का आदेश मानकर खून देने पहुंच गए.

सबने सुनाई अपनी-अपनी कहानी


ईसाई समुदाय के सोनू मसीह पहले एम्‍बुलेंस चलाते थे. सोनू ने मरीजों को कई बार खून के लिए परेशान होते देखा है, इसलिए रक्‍तदान कर मदद करते हैं. अब तक सात बार रक्‍तदान कर चुके हैं. मुस्लिम समाज के युवा खलील खान की बेटी जोया खान की दो वर्ष की उम्र में सरकारी मदद से बेहद जटिल हार्ट सर्जरी हुई और तब से उन्‍होंने भी मरीजों के लिए रक्‍तदान का संकल्‍प लेकर कई बार खून दिया है. वे मानवता को ही मंदिर-मस्जिद की दुआ बताते हैं.

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