साध्‍वी के बयान पर 26/11 पीड़िता ने कहा- हम बेकसूरों को भी लग गया श्राप

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की फाइल फोटो

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की फाइल फोटो

देविका के पिता का ड्रायफ्रूट का बिजनेस था. 26/11 के बाद इस परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. आतंकी हमले की पीड़िता ने कहा कि करकरे देश के लिए शहीद हुए और उनके बारे में ऐसी बयानबाज़ी ठीक नहीं है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 19, 2019, 2:09 PM IST
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मध्य प्रदेश की भोपाल सीट से बीजेपी की उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने 26/11 हमले में शहीद हुए एटीएस चीफ हेमंत करकरे को लेकर बड़ा बयान दिया है. साध्वी ने कहा है कि 'एटीएस चीफ हेमंत करकरे को उनके कर्मों की सजा मिली. उन्हें संन्यासियों का श्राप लगा था. साध्वी प्रज्ञा ने कहा, 'जिस दिन मैं जेल गई थी, उसके 45 दिन के अंदर ही आतंकियों ने उसका अंत कर दिया.'



साध्वी प्रज्ञा के इस बयान को लेकर सियासी गलियारों में भूचाल आ गया है. राजनेताओं में आरोप-प्रत्यारोप के बीच साध्वी प्रज्ञा के इस बयान पर 26/11 मुंबई हमलों की गवाह देविका रोटावन की भावुक कर देने वाली प्रतिक्रिया आई है.



देविका ने कहा, 'साध्वी ने ऐसा श्राप दिया है, तो वह श्राप हमें भी लगा है. आतंकवादियों के साथ आपका कोई फायदा होने का रिश्ता था क्या? 26/11 के हमले में बेकसूर लोगों की मौत हुई. इन लोगों को इस बात की भी खुशी हो रही है. करकरे ने इस देश के लिए बलिदान दिया. उनके बारे में इस तरह की बात कहना बहुत ही गलत है.'





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देविका कहती हैं, 'अभी चुनाव का समय है. इस वजह से वोट हासिल करने के लिए जो मन में आ रहा है, वो बयानबाजी की जा रही है. अभी भी हमारे घाव ताजा हैं. इस पर क्यों नमक छिड़का जा रहा है. यदि कुछ करना ही है, तो पाकिस्तान में छिपकर बैठे मास्टरमाइंड को खत्म कर दिखाओ, लेकिन शहीदों के बारे में तो कम से कम ऐसा मत कहो.'




जिसने दिलवाई गुनहगार को फांसी, उसे ही बुलाते हैं 'कसाब की बेटी'

पाकिस्तानी नागरिक कसाब को 21 नवंबर 2012 को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था. कसाब को फांसी तक पहुंचाने में देविका रोटावन की गवाही सबसे अहम साबित हुई थी. देविका की उम्र उस वक्त महज नौ साल थी. 10 साल बाद अब देविका की जुबानी सबसे बड़े हमले और उसके बाद जिंदगी में आए बदलाव की कहानी.



देविका ने बताया- 'मुंबई पर हुए आतंकी हमले को 10 साल बीत गए, लेकिन हमारी जिंदगी मानो ठहर सी गई. रहने के लिए घर मिलना भी मुश्किल हो गया था. लोगों को बम धमाके या आतंकी हमला होने का डर सताता है. जहां भी रहती हूं, वहां मुझे 'कसाब की बेटी' पुकारा जाता है. यहां आने पर आप किसी से भी पूछिए 26/11 वाली लड़की कहां रहती है, तो वो आपको 'कसाब की बेटी यहां रहती है' बोलकर लेकर आएंगे.'



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26/11 की उस काली रात में देविका को छत्रपति शिवाजी रेलवे टर्मिनस पर पैरों में गोली लगी थी. मुंबई आतंकी हमले की वह सबसे छोटी गवाह थी, जिसने कोर्ट में अजमल कसाब को पहचाना था.



देविका ने कहा- '26/11 का वो दिन, मैं और मेरा परिवार कभी भूल नहीं सकता. मैं अपने पिता और भाई के साथ पुणे जाने के लिए बांद्रा से सीएसटी स्टेशन पहुंची थी. प्लेटफॉर्म नंबर 12 पर हम सभी एक्सप्रेस ट्रेन का इंतजार कर रहे थे. मेरा भाई टॉयलेट के लिए गया, तभी अचानक फायरिंग शुरू हो गई.'



'गोलियों के शोर के बीच चारों तरफ से चीख पुकार सुनाई दे रही थी. पापा ने मेरा हाथ पकड़ा और हम दोनों भी बाकी लोगों की तरह जान बचाकर भागने लगे. तभी मुझे अहसास हुआ कि पैर में कुछ आकर लगा और तेजी से दर्द होने लगा. मैं जमीन पर गिर गई. लोगों के रोने, चीखने की आवाज के बीच मुझे अंधाधुंध फायरिंग करने वाला शख्स नजर आ रहा था. वह मुस्कुरा रहा था और उसके चेहरे पर भी बिलकुल भी शिकन नजर नहीं आ रही थी. वह अजमल कसाब था.'



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मुंबई हमले के बाद चार साल तक देविका को किसी भी स्कूल में एडमिशन नहीं मिला. अभी 11वीं की छात्रा देविका का सपना आईपीएस अफसर बनकर आतंकियों को सबक सिखाना है.




देविका ने कहा कि, 'मेरे पैर में गोली लगी थी. दर्द से कराहते हुए कुछ ही देर में मैं बेहोश हो गई. उस वक्त मैं सिर्फ नौ साल की थी. जब मुझे होश आया, तब मैं कामा अस्पताल में थी. पापा और भाई को देखकर मैं फूट-फूटकर रोने लगी. मेरे पैरे में भयानक दर्द हो रहा था. ऐसा लग रहा था कि किसी ने उस पर पत्थर रख दिया हो. कामा अस्पताल में महीने भर तक मेरा इलाज चला और फिर मुझे जेजे अस्पताल में शिफ्ट किया गया, जहां मेरे कई ऑपरेशन हुए.'



देविका के पिता का ड्रायफ्रूट का बिजनेस था. 26/11 के बाद इस परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. पिता के साथ लोगों ने हमले के डर से पहले कारोबार करना कम कर दिया और बाद में पूरी तरह से बंद कर दिया. इस वजह से उनका कारोबार पूरी तरह ठप हो गया.



देविका ने बताया- 'जेजे अस्पताल में इलाज के दौरान मेरा भाई मेरे साथ था. इस दौरान मेरे जख्मों पर वह मरहम-पट्टी करता था. उसने बड़े मन से अस्पताल में भर्ती बाकी लोगों का भी इलाज किया, लेकिन भाई से एक गलती हो गई. उसने डॉक्टर और नर्सिंग स्टॉफ की तरह हाथों में दस्ताने नहीं पहने. इस वजह से उसे इन्फेक्शन हो गया. गले में गठान हो गई. हम गरीब लोग. हमें पहले तो कुछ समझ में नहीं आया, फिर बाद में उसका इलाज शुरू हुआ. उसके पीठ की हड्डी बाहर निकल गई. मेरे कारण भाई को हमेशा की तकलीफ हो गई. मुझे गोली नहीं लगती तो बाकी लोगों की तरह मेरा भाई में आज सामान्य जिंदगी बिता रहा होता.'



जेजे अस्पताल में इलाज के बाद देविका की सेहत में काफी सुधार हुआ. कई ऑपरेशन के बाद उसकी शारीरिक दिक्कतें दूर हुईं तो पूरा परिवार राजस्थान चला गया. फिर एक दिन मुंबई पुलिस के फोन के बाद उसकी जिंदगी में बदलाव आया.



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'पापा से पूछा कि देविका गवाही देगी कि उसने कसाब को देखा था? पापा और मैंने तय किया, जिस कसाब ने इतने लोगों की जान ली है, उसे सजा मिलनी चाहिए. हम सभी लौटकर मुंबई आ गए. मैं उस वक्त नौ साल की थी. मेरे पैर के घाव भी पूरी तरह से भरे नहीं थे. बैसाखी की मदद से मैं कोर्ट में जाती थी. कोर्ट में जज के पास ही कसाब बैठा हुआ था. मैंने देखते ही उसे पहचान लिया. उसे देखते ही मुझे बहुत गुस्सा आया. मुझे लगा कि उसे बैसाखी फेंककर मार दूं, लेकिन मैं वैसा कर नहीं सकती थी.'




कोर्ट में देविका को शपथ दिलाई गई. जज ने मुझसे पूछा कि तुम्हें शपथ का अर्थ पता है?

'मैंने कोर्ट में कहा, यदि मैं सच बोल रही हूं, तो भगवान मेरा साथ देंगे या फिर मुझे वह शिक्षा देंगे. मेरे पापा और मुझे इस बात का गर्व है कि देश के लिए हम कुछ कर सके.'



मुंबई हमले के गवाह के रूप में नाम सामने आने के बाद देविका, उसके भाई और पिता से रिश्तेदारों ने दूरी बना ली. वो घर पर नहीं बुलाते थे. वो कहते थे कि आतंकियों के खिलाफ गवाही दी है. वो भी हमें मार देंगे. देविका बताती है कि 'उस वक्त बहुत बुरा लगता था. ऐसा क्या गुनाह किया है, जिसकी सजा हमें मिल रही है. यदि हम रिश्तेदार के यहां किसी कार्यक्रमें जाते थे, तो उन्हें बाहर ही ठहरना पड़ता था.'



देविका को बीच में टीबी हो गया था. उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्वीट किया था और आर्थिक परिस्थिति का हवाला दिया. ट्वीट का जवाब नहीं आया, लेकिन इसके बाद दिल्ली से एक अधिकारी का फोन आया और उसने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को इसकी जानकारी देने के लिए कहा था.




देविका बड़ी होकर आईपीएस अधिकारी बनना चाहती है और आतंकवादियों को मारना चाहती है. वह मुंबई पर हमले की साजिश रचने वाले मास्टरमाइंड को सबक सिखाना चाहती हैं.



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देविका ने कहा - 'दस साल बीत गए. वक्त कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. फिर भी पीछे पलटकर देखूं तो लगता है कि वह दिन अभी भी वैसा है. वो सारे जख्म आज भी ताज़ा हैं. कुछ अच्छे तो कुछ बुरे अनुभव आए. हम अच्छे अनुभव को दिल में लेकर जिंदगी का सामना कर रहे है. हम तीनों एक-दूसरे के लिए सब कुछ हैं. मैं लोगों से कहना चाहूंगी कि भले ही लोगों ने हमारे साथ कैसा भी बर्ताव किया हो. हम देश के लिए लड़े और लड़ते रहेंगे.'



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