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Analysis: मध्यप्रदेश में यूरिया संकट से अराजकता के हालात

News18Hindi
Updated: December 10, 2019, 3:02 PM IST
Analysis: मध्यप्रदेश में यूरिया संकट से अराजकता के हालात
मध्य प्रदेश में यूरिया की किल्लत होने से फसल प्रभावित हो रही है.

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में यूरिया संकट (Urea Crisis) विकराल हो चुका है. सरकार कहती है कि केंद्र से सहयोग नहीं मिल रहा, जबकि BJP कहती है कि ये सब कालाबाजारी के लिए हो रहा है. लेकिन सवाल उन किसानों का है, जिनकी फसल बर्बादी के कगार पर है.

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  • Last Updated: December 10, 2019, 3:02 PM IST
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पहले अतिवृष्टि, बाढ़ का शिकार मध्यप्रदेश का किसान इन दिनों यूरिया के भारी संकट का सामना कर रहा है. यूरिया संकट के चलते राज्य में चौतरफा कोहराम और अराजकता के हालात बन गए हैं. यूरिया पाने के लिए सहकारी समितियों की चौखट पर लंबी-लंबी कतारों में किसान थक-हार कर अपना धैर्य खो रहे हैं. नतीजतन जगह-जगह से यूरिया से भरे ट्रक लूटे जाने, धरना, प्रदर्शन, चक्काजाम, पथराव, सरकारी वाहन जला देने, कतारों में लगे किसानों को संभालने पुलिस द्वारा लाठी लहराने, बरसाने की खबरें तेजी से बढ़ी है और सामने आ रही हैं. स्थिति ये है कि थानों से यूरिया वितरित किया जा रहा है. तमाम दावों के बावजूद हालात राज्य सरकार के काबू से बाहर होते दिख रहे हैं. किसानों के लिए यूरिया पाना इन दिनों किला फतह करने जैसा हो गया. इस मुद्दे को लेकर सियासत काफी गरमा गई है. सत्तापक्ष यूरिया की कर्मी का ठीकरा केन्द्र सरकार पर फोड़ रहा है, वहीं प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी का आरोप है, यूरिया पर्याप्त है, लेकिन राज्य सरकार कालाबाजियों को फायदा पहुंचाने कृत्रिम संकट पैदा कर रही है. अकुशल सरकार प्रबंधन भी इस संकट के लिए जिम्मेदार है.

यहां यह बताना जरूरी है कि इस साल मध्यप्रदेश में इस बार मानसूनी बादल लंबे अरसे याने नवंबर तक बरसते रहे. अतिवृष्टि और बाढ़ ने पहले किसानों की खरीफ की फसल बर्बाद कर दी. रबी सीजन के लिए गेंहू की बोवाई का समय भी आगे खिसक गया और अब गेंहू की फसल के लिए यूरिया नहीं मिल रहा है. दरअसल इस कमी के पीछे बड़ा कारण है विस्तारित मानसून. पानी अच्छा गिरा तो गेंहू का रकबा बढ़ गया है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल की तुलना में 8.5 फीसदी ज्यादा गेहूं की बोवाई हुई है. 2019-20 के रबी सीजन में 3.72 मिलियन हेक्टेयर में गेहूं बोया गया है. मप्र में कुल भूमिधारी किसानों की संख्या 88.16 लाख है, जिसमें 20 फीसदी से ज्यादा लघु व सीमांत किसान हैं.


हकीकत दावों के उलट
सरकार ने यूरिया वितरण की 80 फीसदी सहकारी समितियों और 20 फीसदी खाद विक्रेताओं के माध्यम से की है. कृषि विभाग के अधिकारी कहते हैं राज्य में यूरिया की कोई कमी नहीं है. कृषि विभाग के प्रमुख सचिव अजित केसरी भी कहते हैं कि यूरिया संकट जैसी कोई स्थिति नहीं है. किसानों को लगातार यह मिल रहा है. इसके विपरीत मार्केटिंग फेडरेशन(मार्कफेड) के मुताबिक राज्य को केन्द्र से 18 लाख मीट्रिक टन यूरिया की दरकार थी, लेकिन 15.40 लाख टन यूरिया स्वीकृत किया गया और 11 लाख मीट्रिक टन ही अब तक मिल पया है. इसके कारण क्राइसिस पैदा हुआ है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है. प्रदेश के अधिकांश अंचलों की सहकारी समितियों तक यूरिया पहुंचा ही नहीं है. जहां पहुंचता भी है, तो कतारें इतनी लंबी हैं, कि बहुतेरे किसान खाली हाथ इस उम्मीद से लौटते हैं कि शायद कल मिल जाए, लेकिन उनका यूरिया वाला कल आता ही नहीं. पुलिस की लाठी- गाली खाते-सुनते अपनी बारी का इंतजार करते हैं, या फिर धरना-प्रदर्शन करने लगते हैं. उन्हें समझ ही नहीं आ रहा कि सियासी खींचतान में फंसे यूरिया के न मिलने से भविष्य में उनकी जिंदगी किस मुसीबत में फंसने वाली है.

इस समय किसानों को यूरिया की सख्त जरूरत है.


केन्द्र-राज्य में टकराव की नौबत
यूरिया संकट के चलते प्रदेश में सियासत खासी गरमाई हुई है. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा यूरिया संकट को लेकर हल्ला बोलते हुए प्रदेश भर में धरना-प्रदर्शन कर संकट के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है. सड़कों पर कमलनाथ सरकार मुर्दाबाद, सचिन यादव मुर्दाबाद, कांग्रेस मुर्दाबाद, किसानों को ठगने वाली सरकार नहीं चलेगी जैसे नारे गूंज रहे हैं. वहीं जरा कृषि मंत्री मंत्री सचिन यादव के ताजा बयान पर गौर करें, वो कहते हैं जबसे राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी है, तभी से केन्द्र सरकार मप्र सरकार और किसानों से भेदभाव कर रही है.अतिवृष्टि से नुकसान की भरपाई के लिए 8 हजार करोड़ रुपए मुख्यमंत्री श्री नाथ ने मांगे थे, लेकिन सिर्फ एक हजार करोड़ रुपए मंजूर किए गए. प्रदेश के बकाया हजारों करोड़ रुपए का भुगतान नहीं किया जा रहा है. किसानों को फसल बीमा देने के लिए मध्यप्रदेश सरकार अपने हिस्से के 509 करोड़ रुपए से अधिक राशि का भुगतान बीमा कंपनियों को कर चुकी है, लेकिन केन्द्र अपना अंश नहीं दे रही और अब यूरिया की मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं कर कृत्रिम संकट पैदा किया जा रहा है, ताकि किसानों का सरकार के प्रति आक्रोश बढ़े. दूसरी ओर राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव का आरोप है कि मध्यप्रदेश में यूरिया का कोई संकट नहीं है. कालाबाजारियों को फायदा पहुंचाने के लिए संकट का बहाना बनाया जा रहा है.

प्रदेश के सूरते हाल पर एक नजर
यूरिया को लेकर राज्य सरकार की बदइंतजामी, सियासी संग्राम की चक्की में किसान पिसा जा रहा है. आइए जरा प्रदेश के अराजक होते हालातों पर एक नजर डालते हैं.
- सोमवार को विदिशा जिले के शमशाबाद में खाद संकट से जूझते किसान अपना धैर्य खो बैठे. इन गुस्साए किसानों ने बंटने के लिए आये यूरिया से भरा ट्रक लूट लिया. किसान ट्रक पर चढे़ और बोरियां कंधे पर रख भाग निकले.
ब्यावरा में भी किसानों ने प्रदर्शन करते हुए ही मंडी रोड पर यूरिया से भरा ट्रक रोक लिया और वहीं बांटने के लिए मजबूर कर दिया.
- गंजबासौदा जिले में यूरिया का वितरण पुलिस की संगीनों के साए में बांटा जा रहा है. एक किसान अवध नारायण का कहना है कि मुझे जरूरत है 100 बोरी यूरिया की, लेकिन तीन किश्तों में केवल 11 बोरी यूरिया ही मिल पाया है.
- राजगढ़ जिला मुख्यालय पर तो किसान आए दिन हंगामा कर रहे हैं. हाल ही जबलपुर-जयपुर हाइवे पर घंटों जाम लगा दिया था. यहां के किसानों का दर्द है कि हमें जरूरत है 20 बोरी खाद की, लेकिन दिन भर लाइन में लगने के बाद केवल दो बोरी दी जा रही हैं.
- बीना में सोमवार को सैकड़ों किसानों ने यूरिया न मिलने के कारण 20 अर्थियां निकालकर प्रदर्शन किया और अर्थियां चौराहे पर घंटों धरने पर बैठे रहे.
- सागर के मकरोनिया इलाके में पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव, पूर्व मंत्री भूपेन्द्र सिंह समेत कई नेताओं ने बीते शुक्रवार को बड़ा प्रदर्शन किया और गिरफ्तारियां दीं.
- सोमवार को मंदसौर से खबर आई कि 800 से ज्यादा लोग सहकारी समिति के सामने लाइन में लगे थे, लेकिन 340 किसानों को ही यूरिया मिल सका.
- अशोकनगर में अवैध रुप से यूरिया बेचते बालाजी कृषि सेवा केन्द्र से 180 बोरी जब्त की.
किसानों का ये भी दर्द

मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के किसानों का दर्द है कि पहले उन्हें सहकारी समितियों से किसानों को बैंक खातों के आधार उधारी में खाद मिल जाता था. इस राशि को किसान फसल आने पर ब्याज सहित चुकता कर देते थे. लेकिन इस बार एक आदेश जारी कर दिया गया कि नकद राशि जमा करने पर ही किसानों को यूरिया दिया जाएगा. लिहाजा अब मार्कफेड हो या सहकारी समितियां, सभी जगह निजी दुकानों की तरह दाम नकद देना पड़ रहे हैं. कई किसानों की हालत तो इतनी खराब है कि उन्हें अपने घर की महिलाओं के जेवर गिरवी रखकर यूरिया खरीदने के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है. यूरिया संकट को लेकर किसानों में बढ़ रहे गुस्से और पैदा हो रही अराजकता की स्थिति से सरकार नहीं चेती तो कानून व्यवस्था की स्थिति और बिगड़ सकती है.

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First published: December 10, 2019, 3:02 PM IST
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