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ओरछा के 'राजा राम' जिन्हें सलामी देकर पुलिस शुरू करती है अपना काम!

बाबरी विध्वंस के बाद जब पूरा देश जल रहा था उस दौरान भी यहां किसी तरह की अप्रिय घटना नहीं हुई थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 16, 2018, 5:22 PM IST
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राम मंदिर जेहन में आते ही अयोध्या विवाद, रथ यात्रा और बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश भर में हुए सांप्रदायिक दंगों की यादें ताजा हो जाती है. हालांकि मध्य प्रदेश के ओरछा में राम का एक ऐसा भी मंदिर है जहां उनकी पूजा भगवान की तरह नहीं बल्कि राजा की तरह की जाती है. अयोध्या में जहां राम मंदिर को लेकर दो समुदाय कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे हैं वहीं ओरछा में सभी धर्मों के लोग राम को आज भी अपना राजा मानते हैं.

स्थानीय लोगों के मुताबिक बाबरी विध्वंस के बाद जब पूरा देश जल रहा था उस दौरान भी यहां किसी तरह की अप्रिय घटना नहीं हुई थी. हालांकि मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 से ठीक पहले कांग्रेस के सीनियर लीडर दिग्विजय सिंह ने यहां से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू कर इस मंदिर को भी राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिश की.

क्या है 'राजा राम' मंदिर की कहानी
ऐसा कहा जाता है कि ओरछा के महाराजा मधुकरशाह कृष्ण के भक्त थे जबकि उनकी पत्नी गणेशकुंवरि राम की भक्त थीं. एक दिन मधुकरशाह ने अपनी पत्नी से वृंदावन चलने के लिए कहा लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. राजा इससे गुस्सा हो गए और पत्नी से कहा कि अगर इतनी ही बड़ी राम भक्त हो तो ओरछा तभी वापस लौटना जब खुद राम तुम्हारे साथ आएं. इसके बाद रानी अयोध्या चली गईं और सरयू नदी के किनारे साधना करने लगीं. बताया जाता है कि यहां उनकी मुलाक़ात संत तुलसीदास से भी हुई. रानी को कई महीनों तक जब राम के दर्शन नहीं हुए तो वो निराश होकर अपनी जान देने के लिए सरयू में कूद गईं और तभी राम ने उन्हें दर्शन दिए.




राम ने रखी थी तीन शर्तें
कहा जाता है कि राम साथ चलने के लिए तो राजी हो गए थे लेकिन उन्होंने तीन शर्तें रख दी कि उनकी यात्रा सिर्फ पुष्य नक्षत्र में होगी, वे ओरछा तभी जाएंगे जब इलाके में उन्हीं की सत्ता रहे और राजा का शासन पूरी तरह से खत्म हो जाए. इसके अलावा उन्हें जहां पहली बार बिठा दिया जाएगा वो वहीं विराजमान हो जाएंगे. इसी के चलते मधुकरशाह अपना राज्य छतरपुर ले गए और ओरछा में 'रामराज' स्थापित हुआ.

ऐसा भी बताया जाता है कि रानी जब राम को लेकर ओरछा पहुंची तो रात ही चुकी थी और उन्होंने भूलवश उन्हें रसोईघर में ही बिठा दिया, इसलिए आज जो मंदिर है वो महल के रसोईघर में ही है. महल के ही बगल में मंदिर भी बनाया गया लेकिन उस मूर्ति को कोई उसके स्थान से हिला नहीं पाया. यहां एक मान्यता ये प्रचलित है कि राम को ओरछा इतना पसंद है कि वह अयोध्या में रात रुकते हैं और सुबह ओरछा आ जाते है. मंदिर में राम राजा के अलावा सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियां भी स्थापित हैं.



ओरछा के राजा आज भी राम ही हैं
इस मंदिर की सबसे खास बात ये है कि यहां जब सुबह के समय मंदिर के पट खुलते हैं तो सबसे पहले दर्शन पुलिस वाले करते हैं. रोज सुबह पुलिस वाले इस मंदिर में श्रीराम को सलामी देकर ही अपने काम पर निकलते हैं, इसके बाद ही यहां पर भक्‍तों को आने की अनुमति दी जाती है. राजा राम को सूर्योदय के पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात सलामी दी जाती है. इस सलामी के लिए मध्यप्रदेश पुलिस के जवान तैनात होते हैं. बता दें कि इस मंदिर में कोई भी बेल्ट लगाकर नहीं जा सकता, क्योंकि ये राजाराम का है और दरबार में कमर कस कर नहीं जा सकते. सिर्फ राजा राम की सेवा में तैनात सिपाही ही कमरबंद लगा सकते हैं.

ओरछा मंदिर को राजनीति में घसीटने से है नाराजगी
प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने नर्मदा यात्रा के बाद चुनावों ठीक पहले एक और यात्रा शुरू की. इस यात्रा को शुरू करने के लिए उन्होंने ओरछा को चुना और बयान में कहा भी कि बीजेपी ने भगवान राम मंदिर और 'राम गमन पथ' के नाम पर लोगों को ठगने का काम किया है. कांग्रेस ने इन चुनावों से पहले क्या 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राजनीति कर रही है ? इस सवाल के जवाब में प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता रवि सक्सेना कहते हैं कि राम गमन पथ और नर्मदा गमन पथ शिवराज सरकार कि घोषणाएं थी लेकिन उन्होंने अपना वादा नहीं निभाया ऐसे में कांग्रेस ने तय किया है कि साधु-संतों को साथ लेकर राम पथ गमन मार्ग पर यात्रा शुरू की जाएगी. जो सरकार नहीं कर सकी उसे कांग्रेस पूरा करेगी और मार्ग के पर्यटन केंद्रों पर सुविधाएं विकसित करने के आलावा श्रद्धालुओं के रहने के लिए धर्मशालाएं भी बनाई जाएंगी.



ओरछा के स्थानीय निवासी रजनीश दुबे बताते हैं कि जब अयोध्या में कारसेवा हुई थी और उसके बाद देश भर में दंगे हो गए थे तब भी यहां शांति थी और सभी समाज के लोगों में भाईचारा बना हुआ था. उनके मुताबिक ओरछा छोटा शहर है लेकिन यहां मुस्लिमों की आबादी 10 प्रतिशत से ज्यादा है और वो लोग भी राजाराम को ही अपना शासक मानते हैं. रजनीश कहते हैं कि नेता अक्सर राजा राम के दर्शन के लिए आते रहते हैं लेकिन बीते दिनों इस इलाके को भी राजनीति में घसीटने की कोशिश की गई है जो ठीक नहीं है.



इलाके के वरिष्ठ पत्रकार मयंक दुबे का भी मानना है कि दोनों ही पार्टियां धार्मिक यात्राओं के नाम पर राजनीति करती हैं और कांग्रेस अपने फायदे के लिए ओरछा और राम गमन पथ जैसे मुद्दों को हवा दे रही है. मयंक इलाके में सवर्ण आंदोलन को भी ज्यादा प्रभावी नहीं मानते हैं हालांकि उनका मानना है कि इस बार जातिगत आधार पर वोटिंग होगी.

हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है जहांगीर महल
ओरछा के हिंदू राजा वीर सिंह ने अपने खास मित्र जहांगीर (सलीम) के लिए साल 1518 में एक भव्य महल का निर्माण कराया था. इसी को आज इलाके में हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है. ये महल बुंदेला और मुगल शिल्पकला का एक बेजोड़ नमूना है. इस महल का हर कमरा को आधा हिंदू वास्तुकला जबकि आधे को मुस्लिम वास्तुकला के अनुसार बनाया गया था. ये महल एक आयताकार चबूतरे पर बना है और इसके हर कोने पर गोलाकार गुंबद है. इसकी छत पर आठ बड़े धारीदार गुंबद हैं, जिनके बीच छोटे-छोटे गुंबद बनाए गए हैं. इस महल में 236 कमरे हैं. जहांगीर महल खूबसूरत सीढ़ियों और विशाल गेट के लिए प्रसिद्ध है. वहीं, ये महल बुंदेलाओं की वास्तुशिल्प का प्रमाण भी है.
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