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262 सालों से हर साल भगवान कृष्ण यहां करते आ रहे हैं कंस का वध

कंस दशमी के मौके पर शाजापुर में 262 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए भगवान कृष्ण ने रात 12 बजे कंस का वध किया. इससे पहले कृष्ण और दानवों के बीच जमकर वाक युद्ध भी हुआ.

कंस दशमी के मौके पर शाजापुर में 262 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए भगवान कृष्ण ने रात 12 बजे कंस का वध किया. इससे पहले कृष्ण और दानवों के बीच जमकर वाक युद्ध भी हुआ.

कंस दशमी के मौके पर शाजापुर में 262 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए भगवान कृष्ण ने रात 12 बजे कंस का वध किया. इससे पहले कृष्ण और दानवों के बीच जमकर वाक युद्ध भी हुआ.

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कंस दशमी के मौके पर शाजापुर में 262 साल पुरानी परंपरा निभाते हुए भगवान कृष्ण ने रात 12 बजे कंस का वध किया. इससे पहले कृष्ण और दानवों के बीच जमकर वाक युद्ध भी हुआ.

दरअसल, दशमी के मौके पर मथुरा के बाद सिर्फ शाजापुर में ही कंस वध की परंपरा है. इसके लिए दिवाली के दो दिन बाद यहां के कंस चौराहे पर कंस का पुतला रखा जाता है.

जिसके ठीक आठ दिन बाद कंस दशमी के दिन पूरे शहर में भगवान श्री कृष्ण, बलराम और उनके साथी धनसुखा,मनसुखा का रूप लिए कलाकारों का एक चल समारोह निकाला जाता है.

चल समारोह के आजाद चौक पहुंचते ही कृष्ण सेना और दानव बने कलाकारों की सेना आमने-सामने आ जाती है. जिसके बाद शुरू होता है दोनों सेनाओं के बीच वाक युद्ध.

वाक युद्ध करते हुए दोनों सेनाएं कंस चौराहे तक पहुंचती हैं जहां उनके बीच का युद्ध जारी रहता है. उसके बाद ठीक बारह बजे भगवान कृष्ण द्वारा कंस के वध कि परम्परा के तहत कंस के पुतले पर वार करके उसे नीचे गिराया जाता है.

पुतला नीचे गिरते ही वहां खड़े ग्वाला समाज के लोग पुतले को लाठियों से पीटते हैं. जिसके बाद आतिबाजी कर लोग एक-दूसरे को बधाइयां देते हैं.

देर रात तक चलने वाले इस आयोजन को देखने के लिए शहरवासियों के साथ ही आसपास के क्षेत्रों के भी हजारों लोग यहां पंहुचते हैं और कंस दशमी के पर्व को मनाते हैं.

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