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MP : यहां दीपावली के अगले दिन होता है 'मौत का खेल', गायों के पैर से खुद को कुचलवाते हैं लोग

MP : यहां दीपावली के अगले दिन होता है 'मौत का खेल', गायों के पैर से खुद को कुचलवाते हैं लोग

उज्जैन के भीड़ावद गांव में गाय से रौंदने की ये परंपरा पीढ़ियों पुरानी है.

उज्जैन के भीड़ावद गांव में गाय से रौंदने की ये परंपरा पीढ़ियों पुरानी है.

Ujjan NEWS : उज्जैन (Ujain) के भीड़ावद गांव में ये परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. जिसे सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. चार हज़ार की आबादी वाले इस गांव में दीपावली के दूसरे दिन दर्जनों लोग मन्नत लेकर आते हैं और जमीन पर लेट जाते हैं. फिर उनके ऊपर गाय छोड़ दी जाती हैं. दर्जनों गाय (COW) जमीन पर लेटे लोगों के ऊपर से गुजर जाती हैं.

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उज्जैन. आज के युग में भी उज्जैन (Ujjain) में आस्था के नाम पर अंधविश्वास का खेल चल रहा है. यहां लोग खुद को गायों (Cow) के पैर तले रौंदवाते हैं और वो भी खुशी खुशी. दीपावली के अगले दिन मौत का ये खेल होता है, सिर्फ इसलिए कि वो ये मान बैठे हैं कि गाय के पैरों से खुद को रौंदने से साल भर घर में सुख समृद्धि आती है.

उज्जैन के भीड़ावद गांव ऐसी परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जिसे सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. चार हज़ार की आबादी वाले इस गांव में दीपावली के दूसरे दिन दर्जनों लोग मन्नत लेकर आते हैं और जमीन पर लेट जाते हैं. फिर उनके ऊपर गाय छोड़ दी जाती हैं. दर्जनों गाय जमीन पर लेटे लोगों के ऊपर से गुजर जाती हैं. इस मंज़र को देखने के लिए हर साल इस गांव में हजारो लोग जमा होते हैं.

5 दिन मंदिर में ठिकाना
गांव में ये परंपरा कब शुरू हुई किसी को याद नहीं. लेकिन यहां के बुजुर्ग हों या जवान सभी इसे देखते हुए बड़े हुए. इस गांव और आसपास के इलाकों के वो लोग यहां आते हैं जिन्हें मन्नत मांगनी होती है या जिनकी मन्नत पूरी हो जाती है. वो दीपावली के पांच दिन पहले ग्यारस के दिन अपना घर छोड़ देते हैं और यहां माता भवानी के मंदिर में आकर रहने लगते हैं. दिवाली के अगले दिन फिर ये मेला लगता है. जिनकी मन्नत पूरी हो जाती है वो गायों के सामने जमीन पर लेट जाते हैं. इस साल भी गांव के सात लोगों ने मन्नत मांगी थी.

मन्नतियों का जुलूस
दीपावली के अगले दिन इन लोगों को मंदिर में पूजा के बाद जूलूस के रूप में गांव में घुमाया जाता है. फिर ये जमीन पर लेट जाते हैं. पूरे गांव की गाय इन पर छोड़ दी जाती हैं. गायें इन्हें रौंधती हुई निकल जाती हैं. मन्नत मांगने वाले लोगों को पूरा भरोसा रहता है कि पुरखों के समय से चली आ रही इस परंपरा को निभाने से उनकी मुराद पूरी होती है.

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ऐसे होता है पांच दिन का उपवास
पड़वा पर सूरज निकलने से पहले ही ये लोग गौरी पूजन में जुट जाते हैं. लोग अपनी गायों को तैयार करते हैं. उन्हें सजाया जाता है. लोग गांव के चौक में जमा हो जाते हैं. फिर मन्नत मांगने वाले लोगों का एक जुलुस पूरे गांव में निकाला जाता है.जुलूस ख़त्म होने के बाद मन्नत मांगने वाले लोगों को मुंह के बल जमीन पर लिटाया जाता है. उसके बाद गायों को छोड़ दिया जाता है. ये गाय दौड़ते हुए जमीन पर लेटे हुए मन्नतियों के ऊपर से गुजर जाती हैं.

सुख-शांति-समृद्धि का आव्हान
गांव वालों की आस्था है कि गौ माता सुख समृद्धि और शांति का प्रतीक है. शास्त्रों में भी गौ माता के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का वास बताया गया है. ढोल धमाकों के बीच चौक में गाय की पूजा की जाती है. मन्नती पूजा की थाली सजा कर लाते हैं इसमें पूजन सामग्री के साथ गाय का गोबर रखा जाता है. इसकी पूजा साक्षात् गौरी के रूप में की जाती है. पूजा के मां गौरी का आह्वान परंपरागत गीत गा कर करते हैं. इसमे वे मां गौरी से गांव के चौक में आने की विनती करते हैं और सुख, शांति का आशीर्वाद देने का आह्वान करते हैं.

Tags: Cow, Madhya Pradsh News, Superstition, Ujjain news

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