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गर्म सलाखों से दागने पर तड़प उठते हैं बच्चे, मगर आदिवासी नहीं मानते, कानून भी हुआ बेबस

आदिवासियों के आगे बेबस हुआ कानून, खत्म नहीं हो रही गर्म सलाखों से दागने की कुप्रथा
आदिवासियों के आगे बेबस हुआ कानून, खत्म नहीं हो रही गर्म सलाखों से दागने की कुप्रथा

पुलिस (Police) की सख्‍ती के बाद भी उमरिया जिले (Umaria District) में मासूम बच्चों को गर्म सलाखों से दागने के अंधविश्वास के आगे प्रशासन (Administration) बेबस नजर आ रहा है. 800 मासूम बच्चों को दागने के चौंकाने वाले खुलासे के बाद पूरे जिले में निषेधाज्ञा लागू है.

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उमरिया. मध्‍य प्रदेश के उमरिया जिले (Umaria District) में मासूम बच्चों को गर्म सलाखों से दागने के अंधविश्वास के आगे प्रशासन (administration) की सख्ती भी फेल है. जी हां, 800 मासूम बच्चों को दागने के चौंकाने वाले खुलासे के बाद जिले में निषेधाज्ञा (prohibitory Order) लागू करने से भी हैवानियत का ये सिलसिला नहीं रुका है. जबकि दिवाली के मौके पर दागे गए 11 बच्‍चों को लेकर पुलिस (Police) मामला दर्ज कराने की तैयारी में है. आपको बता दें कि ये पूरा इलाका आदिवासी (Tribal) बाहुल्‍य है.

इस वजह से बच्‍चों को दागा जाता है
मासूम बच्चों के पेट, पैर और गले में गर्म सलाखों (लोहे की सरिया, हसिया, नीम की लकड़ी या फिर जलती अगरबत्ती) से दागा जाता है. ये चौंकाने वाली खबर मध्य प्रदेश के उस आदिवासी इलाके की है जहां आज भी लोग इस अंधविश्वास में जी रहे हैं कि ऐसा करने से न सिर्फ बच्चे तंदुरुस्त रहते हैं बल्कि बच्चों को बीमारियों से बचाने का यह अचूक नुस्खा भी है.

कलेक्‍टर के सर्वे में आमने आए चौंकाने वाले आंकड़े
जिले के कलेक्टर स्वरोचिस सोमवंशी ने इस अमानवीयता को समझने के लिए ना सिर्फ सर्वे कराया था बल्कि चौंकाने वाले आंकड़े सामने आने पर इस अंधविश्वास को मिटाने का बीड़ा भी उठाया गया. हालांकि इस दिवाली फिर 11 मासूम बच्चों को गर्म सलाख से दाग दिया गया और जिम्मेदार हैरानी व्यक्त करते रह गए.



जिले में दगना प्रथा को समाप्त करने कलेक्टर ने जागरूकता कार्यक्रमों के साथ ग्राम पंचायत के सरपंचों को पत्र लिखा और धारा 144 जैसे सख्त कदम भी उठाये गए, लेकिन अंधविश्वास के आगे सब बौने साबित हुए लिहाजा अब सभी आरोपियों के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज कराया जा रहा है.

पुरानी है दागने की परंपरा
दरसअल गर्म सलाखों से दागना या आंकना पुराने जमाने की एक ऐसी पारम्परिक कुप्रथा है, जिससे आज भी ग्रामीण इलाकों के लोग जकड़े हुए है. लोगों का मानना है कि ऐसा करने से न सिर्फ छोटे बच्चे रोगमुक्त हो जाते हैं बल्कि कमजोरी और पेट बढ़ने की समस्या से भी निजात मिलती है. जबकि कुछ लोग इसे टोटका मानकर करते हैं, तो कुछ अपनी पुरानी परम्परा को कायम रखने में बच्चों के साथ अमानवीय कृत्य करने में संकोच नहीं करते हैं. यह पूरा अंधविश्वास का खेल त्योहारो के समय खासकर दिवाली में करना शुभ माना जाता है. जानकर इसे स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के साथ जागरूकता के आभाव से जोड़कर तो देखते हैं और आज के वैज्ञानिक युग में भी मासूमों पर हैवानियत से चिंतित भी हैं. जिले सामाजिक कार्यकर्ता संतोष द्विवेदी ने कहा कि ये हैरानी की बात है.

गौरतलब है कि जन्म से छह साल तक के बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण को लेकर कई राष्ट्रीय कार्यक्रम संचालित हैं, बाबजूद इसके आदिवासी अंचलों में इस तरह की कुप्रथाएं कायम रहना हमारे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है. जररूत है सख्ती के साथ इस ईमानदारी से लागू किया जाए, ताकि लोगों को अंधविश्‍वास से मोह भंग हो सके.

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