ग्राउंड रिपोर्ट: विदिशा विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण को लेकर टकराव

करीब चार दशकों से विदिशा विधानसभा पर भाजपा का कब्जा रहा है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज यहां की सांसद हैं. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी यहां से सांसद रह चुके हैं.

News18 Madhya Pradesh
Updated: September 24, 2018, 7:46 PM IST
ग्राउंड रिपोर्ट: विदिशा विधानसभा सीट पर जातीय समीकरण को लेकर टकराव
(विदिशा रेलवे स्टेशन)
News18 Madhya Pradesh
Updated: September 24, 2018, 7:46 PM IST
मध्य प्रदेश में विदिशा जिले की विदिशा विधानसभा सीट बीजेपी के कब्जे में जरूर है, लेकिन कांग्रेस की लगातार सक्रियता और बीजेपी के दावेदारों में अंतरकलह मौजूदा स्थिति में बीजेपी के सामने मुश्किल खड़ी कर सकती है. इस सीट पर जातिगत गणित भी मायने रखता है. बीजेपी में जातिगत समीकरण को लेकर टकराव है, वहीं बीजेपी की अपेक्षा कांग्रेस के दावेदारों में घमासान कम है.

करीब चार दशकों से विदिशा विधानसभा पर भाजपा का कब्जा रहा है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज यहां की सांसद हैं. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी यहां से सांसद रह चुके हैं. इसके बावजूद भी विधायक कल्याण सिंह दांगी की क्षेत्र में निष्क्रियता लगातार बनी है. कल्याण सिंह से आम मतदाता में नाराजगी है.



चुनाव के पूर्व किए गए वायदों का पूरा ना होना, जिसमें किसानों को सिंचाई हेतु पानी की उपलब्धता और पर्याप्त बिजली, नई कृषि उपज मंडी जैसे मुख्य कार्यों का पूरा ना हो पाना क्षेत्रीय मतदातों का नाराजगी का बड़ा कारण है. (ये पढ़ें- #Assembly Elections : सियासत की आग में तप रहे हैं निर्वाचन क्षेत्र)

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क्षेत्र की समस्याएं
2014 के उपचुनाव में विदिशा विधानसभा को आदर्श विधानसभा बनाने की घोषणा की गई थी, लेकिन सुनियोजित विकास ना होने के कारण यह घोषणा पूरी नहीं हो पाई है. मेडिकल कॉलेज और नए अस्पताल का कार्य भी तय सीमा में नहीं हो पाया. युवाओं के लिए रोज़गार देने की बात भी घोषणा पत्र में थी, लेकिन इस दिशा में कोई भी काम नहीं किया गया.

टिकट के दावेदार
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विदिशा विधानसभा सीट 2018 के लिए बीजेपी में दावेदारों की लम्बी लिस्ट है. मौजूदा विधायक कल्याण सिंह दांगी जहां जातिगत समीकरण के सहारे एक बार फिर दावेदारी कर रहे हैं, तो वहीं जिला पंचायत अध्यक्ष तोरण सिंह दांगी जो खुद भी दांगी समाज से आते हैं, जातीय आधार पर इस सीट पर दावेदार बने हुए हैं.

एक अन्य प्रमुख दावेदार मुकेश टंडन भी हैं, जो नगरपालिका अध्यक्ष होने के साथ मुख्यमंत्री के बेहद करीबियों में गिने जाते हैं. वहीं एक और दावेदार श्याम सुंदर शर्मा जो व्यापम के आरोपी और पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के बेहद करीबी माने जाते हैं, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष भी हैं. बीजेपी जिले में किसी ब्राह्मण को टिकट देती है, तो सुंदर शर्मा सशक्त दावेदार हैं. इसी सीट पर एक मात्र महिला दावेदार सुखप्रीत कौर भी सक्रियता बनाए हुए हैं.

पूर्व विधायक गुरुचरण सिंह की पुत्री सुषमा स्वराज की बेहद करीबी हैं और महिला मोर्चा की राष्ट्रीय मंत्री भी हैं. वहीं कांग्रेस में कुल तीन दावेदार हैं. कल्याण सिंह दांगी और जिला पंचायत अध्यक्ष तोरण सिंह दांगी सामजिक समीकरण के चलते प्रबल दावेदार हैं और टिकट ना मिलने की हालत में समाज के वोट पलट सकते हैं.


मुकेश टंडन वर्तमान में नगरपालिका अध्यक्ष हैं और सीएम के विश्वसनीय लोगों में गिने जाते हैं उन्हें पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं सहित कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ सकता है. टंडन की कार्यशैली को लेकर पार्टी में ही नाराजगी जाहिर है, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अध्यक्ष श्यामसुंदर शर्मा भी एक नाम है. लेकिन जातिवाद के आरोप के चलते अन्य समाज पार्टी से किनारा कर सकती हैं.

इस सीट से एक मात्र महिला दावेदार सुखप्रीत कौर भी हैं, जो अपने पिता के स्वर्गवास के बाद क्षेत्र में सक्रिय हुई और दावेदारी में लगी हुई हैं. सुखप्रीत सांसद सुषमा स्वराज की करीबी हैं लेकिन आम कार्यकताओं से और पार्टी के पदाधिकारियों मे इनका भारी विरोध है.

कांग्रेस में भी दावेदारों की लंबी लिस्ट है. पहला नाम शशांक भार्गव का है, जो लगातार तीन चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी रहे हैं. सुरेश पचौरी के काफी नजदीकी शशांक हारने के बाद भी लगातार क्षेत्र में सक्रियता बनाए हुए हैं. 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में सीएम के खिलाफ मात्र 16 हजार वोटों से पराजित हुए थे, लेकिन वर्तमान कांग्रेस जिला अध्यक्ष सहित पार्टी में विरोध बना हुआ है.

दूसरा नाम रणधीर सिंह का है, जो दिग्विजय सिंह खेमे के माने जाते हैं और 1996 में विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, वर्तमान में पत्नी जनपद पंचायत अध्यक्ष हैं. और भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने के चलते अपनी दावेदारी पुख्ता बनाए हुए हैं. वहीं राकेश कटारे भी अपनी दावेदारी बनाए हुए हैं. युवाओं की टीम के सहारे और कमलनाथ की नजदीकी होने के चलते कटारे भी प्रबल दावेदार हैं


विदिशा जिला मुख्यालय की यह विधानसभा वैसे तो वीआईपी विधानसभा कहलाती है. यहां से 2013 में सीएम ने खुद चुनाव लड़ा था. सीएम का गृह क्षेत्र होने के साथ यह सीट सुषमा स्वराज की संसदीय क्षेत्र में भी आती है. विकास के नाम पर विदिशा शहर की हालत खराब है. यातायात व्यवस्था और अतिक्रमण यहां की मुख्य समस्या है. वर्तमान में चल रहे करोड़ों के काम तय समय सीमा में ना होने से आम नागरिक जनप्रतिनिधियों से नाराज हैं.

जातीय समीकरण
203016 मतदाताओं वाली विदिशा विधानसभा में 239 मतदान केंद्र हैं, जिसमें 107101 पुरुष मतदाता और 15917 महिला मतदाता हैं. इस विधानसभा में चालीस हजार मतदाता अनुसूचित जाती और जनजाति के हैं. 20 हजार मतदाता कुशवाह, 22 हजार मतदाता दांगी, 10 हजार मतदाता जैन और शेष मतदाताओं में मुस्लिम समाज सहित अन्य समाज के हैं.

मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद 1957 और 1972 में यहां से कांग्रेस को विजय मिल पाई थी. 1980 से यहां लगातार भारतीय जनता पार्टी का कब्ज़ा बरकरार है. पिछले 3 चुनाव मे लगातार यहां जीत का अंतर कम होता चला जा रहा है. 2003 में 29543 का अंतर 2008 के चुनाव में 12000 पर आ गए थे. 2013 में मुख्यमंत्री खुद 16000 वोटों से चुनाव जीत पाए थे. 2014 में हुए उपचुनाव में कल्याण सिंह दांगी 12000 वोटों से चुनाव जीते थे.
(मनोज राठौर के साथ विदिशा से भरत राजपूत की रिपोर्ट)
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