मध्‍य प्रदेश की इन लोकसभा सीटों पर रही कांटे की टक्‍कर

News18
Updated: May 15, 2014, 4:35 PM IST
मध्‍य प्रदेश की इन लोकसभा सीटों पर रही कांटे की टक्‍कर
इस बार लोकसभा चुनाव में मध्‍य प्रदेश की कुछ खास सीटों पर सबकी नजरें थी। इन सीटों पर चुनावी जंग के लिए उम्‍मीदवारों ने अपना सबकुछ झोंक दिया। हालांकि जनता ने उन्‍हीं उम्‍मीदवारों को चुना जो उनकी कसौटी पर खड़े उतरे।

इस बार लोकसभा चुनाव में मध्‍य प्रदेश की कुछ खास सीटों पर सबकी नजरें थी। इन सीटों पर चुनावी जंग के लिए उम्‍मीदवारों ने अपना सबकुछ झोंक दिया। हालांकि जनता ने उन्‍हीं उम्‍मीदवारों को चुना जो उनकी कसौटी पर खड़े उतरे।

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इस बार लोकसभा चुनाव में मध्‍य प्रदेश की कुछ खास सीटों पर सबकी नजरें थी। इन सीटों पर चुनावी जंग के लिए उम्‍मीदवारों ने अपना सबकुछ झोंक दिया। हालांकि जनता ने उन्‍हीं उम्‍मीदवारों को चुना जो उनकी कसौटी पर खड़े उतरे।

विदिशा:
विदिशा में सुषमा स्‍वराज और दिग्विजय सिंह के छोटे भाई लक्ष्‍मण सिंह में कड़ी टक्‍कर देखने को मिली। भाजपा की कद्दावर नेता सुषमा स्वराज छह बार सांसद, तीन बार विधायक और फिलहाल लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। वह पूर्व केन्द्रीय मंत्री और दिल्ली की पूर्व मुख्‍यमंत्री भी हैं। 1977 में उन्हें मात्र 25 साल की उम्र में हरियाणा की कैबिनेट का मंत्री बनाया गया था और 27 साल की उम्र में वह राज्य जनता पार्टी की प्रमुख बन गई थीं। अक्टूबर 1998 में उन्होंने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। 1999 में उन्होंने आम चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी (कर्नाटक) से चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गईं। 2000 में वे फिर से राज्यसभा में पहुंचीं थीं और उन्हें पुन: सूचना-प्रसारण मंत्री बना दिया गया। वे मई 2004 तक सरकार में रहीं। अप्रैल 2009 में वे मध्यप्रदेश से राज्यसभा के लिए चुनी गईं और वे राज्यसभा में प्रतिपक्ष की उपनेता रहीं।

राष्‍ट्रीय स्‍तर पर लक्ष्‍मण सिंह की असली पहचान कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह के छोटे भाई के रूप में है। लक्ष्मण सिंह अब तक पांच बार सांसद बन चुके हैं, लेकिन वह विदिशा से सटे अपने परिवार की परंपरागत राजगढ़ संसदीय सीट से प्रतिनिधि रहे हैं। वह पिछले साल अगस्‍त तक भाजपा में थे। वह भाजपा के टिकट पर दो बार सांसद भी रह चुके हैं। भाजपा के उस समय के अध्यक्ष नितिन गडकरी के उस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई थी, जिसमें उनके भाई दिग्विजय सिंह को ‘औरंगजेब की औलाद’ कहा गया था। लक्ष्मण सिंह ने गडकरी से माफी मांगने या पद से हटने की मांग कर डाली थी। इसके बाद भाजपा ने लक्ष्मण सिंह की प्राथमिक सदस्यता समाप्त कर दी थी। इलाके के लोग लक्ष्‍मण को छोटे राजा साहब भी कहते हैं।

गुना:
गुना में कांग्रेस के ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया और भाजपा के जय भान सिंह पवैया के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्‍प रहा। वैसे भी सिंधिया परिवार भारतीय राजनीति के सबसे पुराने राजनीतिक घरानों में गिना जाता हैं। इस परिवार से विजयराजे सिंधिया और माधवराव सिंधिया जैसे नेता इस देश को दिए। शुरुआत में ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया की पहचान दिवंगत कांग्रेसी माधवराव सिंधिया के बेटे के रूप में रही, पर धीरे-धीरे उन्‍होंने अपनी अलग शख्सियत बनाई। सितंबर, 2001 में माधवराव सिंधिया की अकस्‍मात मौत के बाद 2002 में पहली बार कांग्रेस की टिकट पर वे गुना से सांसद बने। 2004 और 2009 में फिर से गुना की जनता ने उन्‍हें अपना सांसद चुना। सबसे अमीर कैबिनेट मंत्रियों की सूची में ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया (25 करोड़) शामिल हैं।

बजरंग दल के अध्‍यक्ष रह चुके जय भान सिंह पवैया की पहचान हिंदुत्‍ववादी नेता के तौर पर रही है। पहली बार 1999 में वे ग्‍वालियर से सांसद बने, लेकिन अपनी इस पारी को लंबी नहीं खींच पाए। 2004 में उन्‍हें हार का सामना करना पड़ा। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ग्‍वालियर सीट से उतारा और वे जीतने में कामयाब रहे।
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छिंदवाड़ा:
छिंदवाड़ा में कांग्रेस के कमलनाथ को भाजपा प्रत्‍याशी चंद्रभान सिंह चौधरी ने जबर्दस्‍त चुनौती दी। 1980 में पहली बार कमलनाथ छिंदवाड़ा में चुनाव जीते थे। इसके बाद से कमलनाथ हर बार यहां से जीतते रहें। केंद्रीय राजनीति में कमलनाथ का दबदबा हमेशा कायम रहा। कमलनाथ 1991-95 तक वन और पर्यावरण और 1995 से 1996 तक टेक्सटाइल राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रहे। जनवरी 2011 में उन्होंने शहरी विकास मंत्रालय की कमान संभाली। बाद में उन्‍हें संसदीय मामलों का प्रभार भी दिया गया।

चंद्रभान सिंह चौधरी भी राजनीति के कमजोर खिलाड़ी नहीं हैं। चंद्रभान दो बार लोकसभा के अलावा पांच बार विधानसभा का चुनाव लड़े, जिसमें से तीन बार जीते और दो बार मंत्री बने। सबसे रोचक बात यह है कि लोकसभा में उनके सामने अधिकतर कमलनाथ ही रहे। 1996 के चुनाव में भी भाजपा ने चंद्रभान को अलका नाथ के सामने उतारा, लेकिन वे फिर हार गए। 2003 में उमा भारती की सरकार में वे मंत्री बने, लेकिन 2008 का विधानसभा चुनाव हार गए।

मऊ:
मऊ में भाजपा उम्‍मीदवार कैलाश विजयवर्गीय और कांग्रेस के अंतर सिंह दरबार के बीच दिलचस्‍प मुकाबला रहा। मौजूदा समय में कैलाश विजयवर्गीय शिवराज सरकार में उद्योग मंत्री हैं। वाणिज्य, सूचना प्रौद्योगिकी और ग्रामीण उद्योग जैसे प्रमुख विभागों की जिम्मेदारी भी उनके ही जिम्मे है। 2002-03 तक इंदौर के मेयर रह चुके कैलाश को 2000 में उन्हें ऑल इंडिया मेयर काउंसिल का चेयरमैन नियुक्त किया गया। 2011 और 2013 में उन्होंने मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन का चुनाव भी लड़ा, लेकिन दोनों बार ज्योतिरादित्य सिंधिया से परास्त हो गए। 2013 में उन्हें इंदौर डिविजनल क्रिकेट एसोसिएशन के प्रमुख चुना गया।

अंतर सिंह दरबार प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता माने जाते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर के बाद भी वे 3199 मतों से जीत गए थे। इससे पहले 1998 में भी दरबार 10506 मतों से जीते थे। दरबार ने दोनों बार भाजपा के सशक्त नेता भेरूलाल पाटीदार को हराया था। पिछले चुनाव में उनकी जीत का वजन इसलिए भी था, क्योंकि कांग्रेस के केवल 38 नुमाइंदे ही विधानसभा में पहुंच पाए थे।

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First published: May 15, 2014, 4:35 PM IST
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