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Opinion:बीजेपी ने मध्य प्रदेश में सत्ता की बागडोर आखिर शिवराज चौहान को ही क्यों सौंपी
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News18India.com
Updated: March 23, 2020, 8:27 PM IST
Opinion:बीजेपी ने मध्य प्रदेश में सत्ता की बागडोर आखिर शिवराज चौहान को ही क्यों सौंपी
शिवराज सिंह चौहान रात 9 बजे लेंगे सीएम पद की शपथ. (फाइल फोटो)

नरेंद्र सिंह तोमर का नाम जरूर चर्चा में था, फिर भी क्यों सीएम की कुर्सी शिवराज सिंह चौहान को ही सौंपी गई. आखिर क्या कारण रहे हैं 15 साल तक मुख्यमंत्री रह चुके चौहान को फिर से सत्ता सौंपने के?

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शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बन रहे हैं. ऐसा लगता है कि बीजेपी आलाकमान ने सभी विकल्पों पर विचार करने के बाद चौहान के नाम को अंततः हरी झंडी दे दी. इसका कारण ये है कि 2018 के चुनाव में अगर भाजपा को बहुमत मिलता तो शिवराज सिंह चौहान ही मुख्यमंत्री पद के सबसे तगड़े दावेदार थे, क्योंकि उस समय वे मुख्यमंत्री थे, लेकिन बहुमत नहीं आया. फिर भी अगर बीजेपी सरकार बनाने से बहुत दूर नहीं थी. जैसा कांग्रेस ने किया वैसा बीजेपी भी कर सकती थी.

शिवराज सिंह की ताकत क्या है
निर्दल विधायकों को अपने साथ लेकर वो भी सरकार बनाने की युक्ति कर सकती थी, लेकिन आलाकमान ने इसकी अनुमति नहीं दी. इससे कयास ये लगाए गए कि पार्टी आलाकमान शिवराज सिंह चौहान को 15 साल मुख्यमंत्री रखने के बाद फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी देने का इच्छुक नहीं है. इससे अलग शिवराज सिंह चौहान के साथ ये बहुत अच्छी बात है कि वे अकेले मध्य प्रदेश के सबसे सक्रिय नेताओं में से एक हैं. किसी भी पार्टी में वे सबसे सक्रिय औऱ लोकप्रिय है. ये उनकी ताकत है और यही उन्हें दूसरों से अलग रखता है.

पहले भी सिंधिया-शिवराज की लंबी मुलाकात हुई थी



इस लिहाज से शिवराज सिंह का दावा कमलनाथ सरकार के अल्पमत में आने के बाद अपने आप मजबूत हो गया. कमलनाथ सरकार के अल्पमत में आने का कारण सभी को पता है कि ग्वालियर-इंदौर इलाके में सिंधिया को लेकर कांग्रेस विधायकों में नाराजगी बढ़ गई. वे विधायक पार्टी से अलग हो गए. लेकिन ये बहुत कम लोगों को मालूम है कि जब 2018 चुनाव के नतीजे आए थे. तब उसके महीने भर बाद ज्योतिारदित्य सिंधिया भोपाल आए थे और शिवराज सिंह चौहान के घर में अकेले मुलाकात और बातचीत हुई थी. उस भेंट को भी लेकर कई कयास लगाए गए. हालांकि समाचार पत्रों में इसे शिष्टाचार मुलाकात कह कर इसकी अनदेखी की गई. लेकिन ये भी ध्यान रखने वाली बात है कि कोई शिष्टाचार मुलाकात घंटे-दो घंटे भर नहीं चलती है, जो कि इन दोनों के दौरान चली. मैं उन दिनों भोपाल में था. मुझे तो ये अंदाज हो गया था कि जल्द ही कुछ होगा.

तब पहले ही क्यों नहीं गिरी कमलनाथ सरकार
मुझे लगता है कि जब तक आलाकमान ने शिवराज सिंह चौहान को हरी झंडी नहीं दी, तब तक उन्होंने सिंधिया समर्थक विधायकों को अपने पाले में करने की कोई कोशिश नहीं की. यही कारण है कि कमलनाथ सरकार सवा साल टिक गई. अन्यथा कमलनाथ जी की सरकार उसी समय गिर सकती थी.

पहले शिवराज के नाम पर क्यों लोगों को संशय था
शिवराज सिंह चौहान को लेकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में संकोच की बातें क्यों उठती हैं. शायद इसका एक कारण ये भी है कि शिवराज सिंह चौहान उन दिनों नेता बने या पार्टी में ऊपर चढ़ते गए जब लालकृष्ण आडवाणी बीजेपी के अध्यक्ष होते थे. उनको आडवाणी का प्रतिनिधि माना जाता रहा है. राजनीति में ये भी कहा गया जाता रहा कि अब मोदी जी प्रधानमंत्री हैं तो जो लोग आडवाणी के लोग माने जाते रहे वे अपने आप ही धीरे-धीरे एक साइड होते चले गए. लेकिन मैं बीजेपी की कार्यप्रणाली को जानता हूं. बीजेपी जैसा दिखती है वैसी है नहीं. शिवराज सिंह चौहान के साथ ऐसा कोई कारण नहीं था.

कई बार तारीफ कर चुके हैं पीएम मोदी
पीएम मोदी शिवराज सिंह की सरकार के काम-काज से बहुत खुश थे. लोगों को ध्यान होगा कि लाडली लक्ष्मी योजना चौहान सरकार की ही थी, जिसे पीएम मोदी ने केंद्र की योजनाओं में शामिल किया. उन्होंने हर बार शिवराज सरकार की अच्छी योजनाओं की तारीफ की. इस लिहाज से जो लोग ये कहते हैं कि शिवराज सिंह, पीएम मोदी की पसंद नहीं थे, वो ठीक नहीं है. दरअसल शिवराज सिंह 15 साल रह चुके थे तो मध्य प्रदेश में भी अलग-अलग गुट हो सकते हैं. लेकिन मुझे लगता है कि बीजेपी की अंदरूनी खींचतान के कारण ही पार्टी आलाकमान उन्हें तुरंत सरकार बनाने की इजाजत नहीं दे रहा था.

नरेंद्र सिंह तोमर क्यों नहीं
अब देखा गया कि स्थितियां बदल जाने के बाद से नरेंद्र सिंह तोमर का नाम आगे आ रहा था. तोमर ग्वालियर चंबल इलाके से ही नेता हैं. वे केंद्र में मंत्री हैं. विधायक रहते हे वे शिवराज सिंह सरकार में मंत्री हुआ करते थे. लंबा अनुभव हैं. कम बोलने वाली साफ-सुथरी छवि के सक्रिय नेता हैं. उनकी छवि अच्छी है. वे शिवराज सिंह चौहान के घनिष्ठ मित्र भी हैं. दोनों लगभग एक समय में ही मध्य प्रदेश की राजनीति में युवा मोर्चा के जरिए उभरे. दोनों की दोस्ती जबर्दस्त है. अगर नरेंद्र सिंह तोमर के नाम पर फैसला लिया जाता तो भी लोग कहते कि शिवराज सिंह की सरकार बन गई. ऐसा भी माना जाता है कि अगर तोमर का नाम आगे लाया जाता तो वे ये भी कह सकते थे कि दावा तो शिवराज सिंह चौहान का बनता है. उन्हीं को बना दीजिए, मुझे केंद्र में रहना है.

जातिगत समीकरणों की अनदेखी संभव नहीं
दूसरी बात पार्टी के सामने संकट ये है कि पार्टी ने अपना प्रदेश अध्यक्ष एक ब्रह्मण को बनाया है. मध्य प्रदेश की राजनीति में जाति भी अहम है. नरेंद्र सिंह तोमर चंबल के राजपूत हैं. तो दो सवर्ण जातियों के लोगों को पार्टी संगठन और राज्य की एक साथ कमान नहीं सौंप सकती थी. शिवराज सिंह चौहान ओबीसी समुदाय से हैं जिसकी प्रदेश में बहुलता है. इस समुदाय ने तीन मुख्यमंत्री भाजपा को दिए हैं. पार्टी इसकी अनदेखी नहीं कर सकती थी.

बागी कांग्रेस नेताओं से शिवराज की निकटता
एक और महत्वपूर्ण बात ये है शिवराज सिंह चौहान के व्यक्तिगत संबंध और घनिष्ठता बहुत जबर्दस्त है. इस लिहाज से भी स्वाभाविक तौर पर उनकी दावेदारी थी. वे प्रदेश में रहना चाहते थे. प्रदेश में उनकी लोकप्रियता ज्यादा है और प्रदेश में उनकी तरह का दूसरा कोई नेता नहीं है. इस लिहाज से कहा जा सकता है कि पार्टी ने किसी मजबूरी में उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया. बल्कि कहा जा सकता है पार्टी ने योग्य नेता को कमान सौंपी है. मेरा मानना है कि सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के साथ उनके समीकरण अच्छे हैं और उनकी सरकार ठीक ठाक चल जाएगी.

( जगदीश गुप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं और माखनलाल विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति भी रह चुके हैं. ये उनके निजी विचार है.)

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First published: March 23, 2020, 8:27 PM IST
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