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त्वरित टिप्पणी- क्यों सदन में जाने की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कमलनाथ ने दिया इस्तीफा?
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News18Hindi
Updated: March 20, 2020, 1:44 PM IST
त्वरित टिप्पणी- क्यों सदन में जाने की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कमलनाथ ने दिया इस्तीफा?
कमलनाथ (फाइल फोटो)

सदन में बहस करके अपनी बात सबके सामने रखने की संसदीय परंपरा रही है, अटल विहारी वाजपेयी की 13 दिनों की अल्पमत सरकार में भी अपनी बात देश के सामने रखने के लिए इस परंपरा को निभाया गया था. भोपाल में कमलनाथ ने सिर्फ अपने 15 महीने का रिपोर्ट कार्ड रखा और कल के बाद परसों की बात करके एक खास संदेश दिया.

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  • Last Updated: March 20, 2020, 1:44 PM IST
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नई दिल्ली/भोपाल. विधान सभा में अगर सरकार का शक्ति परीक्षण होता और उस पर चर्चा कराई जाती तो सदन में जो मुद्दे उठाए जाते विपक्षी दल भी उसका जवाब देते. जबकि सदन से बाहर मीडिया से मुखातिब हो कर कमलनाथ ने जनता से अपनी बात कह दी. साथ ही ये भी कह दिया –“कल के बाद परसो भी होगा.” इसके जरिए उन्होंने भी संदेश दे दिया कि वे चुप बैठने वाले नहीं है.

क्या सुबह तक दिग्विजय और कमलनाथ का अनुमान कुछ और था ?

साढ़े चार दशक से ज्यादा वक्त राजनीति में गुजारने वाले कमलनाथ बिना किसी राजनीतिक पैंतरे के रुकने वाले नहीं थे. उनके रणनीतिकारों को यकीन था कि वे बीजेपी से पांच विधायकों का इस्तीफा करा लेंगे. इसकी एक बड़ी वजह ये भी है कि कांग्रेस को शरद त्रिपाठी के साथ का पूरा यकीन था ही. इसके अलावा शरद कौल भी कमलनाथ के साथ तकरीबन आ ही चुके थे. इसके अलावा ये भी कहा जा रहा था कि तीन और बीजेपी विधायक सरकार के साथ बताए जा रहे थे. ये कहा जा रहा था कि इन विधायकों के बारे में सिर्फ दिग्विजय सिंह और कमलनाथ को थी.

और अंत में बात नहीं बनी



आखिरी दौर में लगता है बात नहीं बनी. इसके अलावा जिस तरह से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मतदान में शामिल न होने का फैसला ले लिया उससे कांग्रेस की दिक्कतें और बढ़ गईं.
सुबह सत्ता के गलियारों से ये खबरें भी आ रही थी कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कमलनाथ सरकार रिवीजन की अपील भी कर सकती है. सत्ता के नजदीक रहने वाले तमाम सूत्र लगातार ये बात कह रहे थे. कमलनाथ के प्रेस कांफ्रेस के ऐन पहले उनकी सरकार के एक मंत्री ने जिस तरह से मीडिया में ये कहना शुरू किया प्रेस कांफ्रेस में आज खुलासे होंगे. उस दौर तक लग रहा था कि कमलनाथ कोई चमत्कार करने जा रहे हैं. लेकिन उसके ठीक बाद जब कमलनाथ ने बोलना शुरू किया तो साफ हो गया कि वे अपने पन्द्रह महीने का रिपोर्ट जनता में रखना चाहते हैं.

सदन में बहस की लंबी परंपरा है

आम तौर पर परंपरा ये रही है सदन में चर्चा के दौरान सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष दोनों अपने अपने पक्ष रखते रहें हैं. सदन में की गई चर्चा ऑन रिकॉर्ड होता है और माना जाता है कि ये आने वाले समय के लिए दस्तावेज के तौर पर रहेगा. इसी कारण नेता लोग अब तक संसदीय परंपरा में अपनी बात दर्ज कराते रहे हैं. 13 दिनों की अपनी सरकार के दौरान अटल विहारी वाजपेयी ने भी इसका पालन किया था. इसके अलावा कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस परंपरा को निभाया है. यहां कमलनाथ ने इसका अवसर ही नहीं आने दिया और गणित समझ कर जनता के बीच अपनी बात रख कर इस्तीफा देने चले गए.

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First published: March 20, 2020, 1:40 PM IST
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