अब नागपुर विश्वविद्यालय के छात्र BA में पढ़ेंगे आरएसएस का इतिहास

अब महाराष्ट्र के छात्रों को विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पढ़ाया जाएगा. राष्ट्रसंत तुकादोजी महाराज, नागपुर विशविद्यालय ने अपने बीए इतिहास के पाठ्यक्रम में आरएसएस के योगदान को शामिल किया है.

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Updated: July 9, 2019, 10:37 PM IST
अब नागपुर विश्वविद्यालय के छात्र BA में पढ़ेंगे आरएसएस का इतिहास
महाराष्ट्र के एक विश्वविद्यालय में RSS के भारत के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को पढ़ाया जाएगा (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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Updated: July 9, 2019, 10:37 PM IST
(हर्शल महाजन और प्रवीण मुधोलकर)

अब महाराष्ट्र के छात्रों को विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पढ़ाया जाएगा. राज्य के राष्ट्रसंत तुकादोजी महाराज नागपुर विशविद्यालय ने अपने बीए के पाठ्यक्रम को संशोधित किया है ताकि 1885-1947 के बीच भारतीय इतिहास में आरएसएस के योगदान को शामिल किया जा सके.

यह पहला मौक़ा है जब किसी विश्वविद्यालय ने हिंदूवादी संगठन के इतिहास को अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है. विश्वविदयालय में बीए के दूसरे वर्ष के पाठ्यक्रम को हाल ही में संशोधित किया गया है. पाठ्यक्रम के भारतीय इतिहास: 1885-1947 पेपर 4T1 में आरएसएस के बारे में अध्याय दिए गए हैं. तीसरा खंड 'राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की भूमिका' से संबंधित है. पाठ्यक्रम में आरएसएस के इतिहास को शामिल करने के नागपुर विश्वविद्यालय के निर्णय की महाराष्ट्र के शिक्षा जगत में काफ़ी आलोचना हो रही है पर कोई भी शिक्षाविद इस मामले को लेकर ऑन रिकॉर्ड बात करने के लिए तैयार नहीं है.

1885 से 1947 के बीच RSS के स्वतंत्रता संग्राम में रोल के बारे में पढ़ाया जाएगा

दिलचस्प बात यह है कि आरएसएस की स्थापना 27 सितम्बर 1925 को नागपुर में ही हुई थी. बीए के नए पाठ्यक्रम के प्रथम खंड में कांग्रेस का इतिहास भी दिया गया है. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना, नरम राजनीति -1885-1905, उग्रवाद का उत्थान एवं विकास – 1905-1920 जैसे विषय भी पाठ्यक्रम के यूनिट 1 में शामिल किए गए हैं. राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की भूमिका को 1885-1947 के दौरान भारतीय इतिहास के तहत शामिल किया गया है. नागपुर विश्वविद्यालय का अपने पाठ्यक्रम को संशोधित करने से शिक्षा के कथित 'भगवाकरण' का विवाद दुबारा उठ सकता है. इससे पहले वाजपेयी सरकार के दौरान देश में शिक्षा के 'भगवाकरण' का विवाद उठा था. वर्ष 2000 में मुरली मनोहर जोशी वाजपेयी सरकार में मानव संसाधन मंत्री थे. उस समय विपक्ष ने शिक्षा के 'भगवाकरण' का आरोप लगाया था.

यह पाठ्यक्रम खड़े कर सकता है देश भर में विवाद
हालांकि जब आरएसएस को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने के बारे में पूछा गया तो पाठ्यक्रम समिति के सदस्य सतीश चफले ने कहा, “यह कोई नई बात नहीं है. वर्ष 2002 से आरएसएस का इतिहास एमए पाठ्यक्रम का हिस्सा रहा है. इस बार अंडरग्रैजुएट स्तर पर इसका संक्षिप्त हिस्सा शामिल किया गया है और हमने बीए के पाठ्यक्रम में इसके एक छोटे हिस्से को ही शामिल किया है.
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हिन्दी के विभागाध्यक्ष प्रमोद शर्मा ने कहा, “यह इतिहास है. इतिहास के अलावा और कोई उद्देश्य नहीं है. इस पाठ्यक्रम को तीन चुनाव समितियों ने पास किया है और इसके बाद ही विश्वविद्यालय ने इसको अंतिम रूप दिया है”.

विरोध में सामने आए हैं कई लोग
लेकिन आरएसएस को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने से बहुत लोगों में नाराज़गी है. आईएसआई के पूर्व अधिकारी और अब सामाजिक कार्यकर्ता, एज़ेड खोबरागाड़े ने कहा, “यह संविधान के विरुद्ध है. आरएसएस एक सांस्कृतिक संगठन है. वह संविधान में विश्वास नहीं करता. विश्वविद्यालय ऐसे लोगों के इतिहास को पाठ्यक्रम में क्यों शामिल करता है जो देश के संविधान में विश्वास नहीं रखते”?

कुछ लोगों का मानना है कि विश्वविद्यालय ने राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की भूमिका को पाठ्यक्रम में शामिल किया है और ऐसा उन लोगों के विचारों को ख़ारिज करने के लिए किया गया है जो यह कहते हैं कि आरएसएस देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कभी भी सक्रिय रूप से शामिल नहीं रहा.

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First published: July 9, 2019, 10:15 PM IST
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