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OPINION : पवार और ठाकरे में सत्ता को लेकर जंग से कब तक सुरक्षित रहेगा महाअघाड़ी?
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News18Hindi
Updated: February 19, 2020, 12:36 PM IST
OPINION : पवार और ठाकरे में सत्ता को लेकर जंग से कब तक सुरक्षित रहेगा महाअघाड़ी?
शरद पवार और उद्धव ठाकरे

जब शिवसेना (Shiv Sena) ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और कांग्रेस से हाथ मिलाया. तब मौजूदा शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने ठाकरे परिवार की परंपरा तोड़ दी. ठाकरे परिवार से पहली बार कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा. हालांकि, तब ऐसा लगा कि सत्ता की धुरी एनसीपी प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar) की तरफ मुड़ गई है, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है.

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  • Last Updated: February 19, 2020, 12:36 PM IST
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(धवल कुलकर्णी)

मुंबई. महाराष्ट्र (Maharashtra) की सियासत में ये अघोषित परंपरा बनी हुई है कि ठाकरे परिवार (Bal Thackeray Family) औपचारिक तौर पर सरकार में नहीं होते हुए भी सत्ता का हिस्सा बना रहता है.

साल 1995 में जब राज्य में शिवसेना-बीजेपी की गठंबधन सरकार बनी, तो शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सरकार में कोई पद लेने से इनकार कर दिया. उन्होंने शिवसेना की ओर से पहले मनोहर जोशी और उसके बाद नारायण राणे का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर आगे बढ़ाया. बाल ठाकरे की इस रणनीति के कई फायदे भी हुए.

साल 2004 में लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के 'अंतर आत्मा की आवाज' सुनने के पहले तक ठाकरे परिवार को ही एकमात्र ऐसे परिवार के रूप में देखा जा रहा था, जो सरकार के बाहर रहते हुए अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा हो. लेकिन, अपनी पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करते हुए तत्कालीन शिवसेना सुप्रीमो (बाल ठाकरे) ने राजनीति में 'रिमोट कंट्रोल' शब्द का भी इस्तेमाल किया. इसके जरिए ठाकरे ने संकेत दिया कि वह भले ही सरकार में नहीं हैं, लेकिन सरकार वही चलाएंगे.



जब शिवसेना ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और कांग्रेस से हाथ मिलाया. तब मौजूदा शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने ठाकरे परिवार की परंपरा तोड़ दी. ठाकरे परिवार से पहली बार कोई मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा. हालांकि, तब ऐसा लगा कि सत्ता की धुरी एनसीपी प्रमुख शरद पवार की तरफ मुड़ गई है.


कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी के 'महाराष्ट्र महाअघाड़ी विकास गठंबधन' को मूर्त देने का क्रेडिट शरद पवार को दिया गया. इसके साथ ही पवार बागी भतीजे अजित पवार को मनाकर वापस लाने में भी कामयाब रहे, जो अभी उद्धव ठाकरे के डिप्टी हैं. ऐसा माना जा रहा था कि इतना सब कुछ होने के बाद अब सत्ता का रिमोट कंट्रोल मातोश्री (उद्धव ठाकरे का आवास) से कैंडी ब्रीच स्थित सिल्वर ओक' (शरद पवार का घर) पर आ गया है. लेकिन, ऐसा होता नहीं दिख रहा.

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महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे


हालांकि, हाल के दो घटनाक्रमों से संकेत मिलता है कि उद्धव ठाकरे उस रिमोट कंट्रोल में किसी और को भागीदार बनाने के उत्सुक नहीं हैं. कम से कम अभी तो नहीं.

जब कांग्रेस और एनसीपी ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC), नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) का खुलकर विरोध किया, तो शिवसेना ने इनका समर्थन किया. रिपोर्ट्स में ये भी कहा जा रहा है कि विपक्ष और सहयोगी पार्टियों को दरकिनार कर शिवसेना राज्य में एनपीआर लागू करने की तैयारी भी कर रही है.

उद्धव ठाकरे का कहना है कि एनपीआर देश की जनगणना से जुड़ी एक प्रक्रिया है, जो हर 10 साल बाद होती है. इससे महाराष्ट्र के लोगों को कोई खतरा नहीं है. पवार इस पर उद्धव ठाकरे से एकमत तो नहीं रखते. हालांकि, वह ये मानते हैं कि सरकार के इस फैसले से गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा.


दूसरी घटना से महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार को फर्क पड़ सकता है. ये घटना है भीमा-कोरेगांव हिंसा और एल्गार परिषद केस का. इस हिंसा के मामले में पुणे पुलिस ने कई वामपंथी विचारधारा के लोगों और दलित एक्टिविस्ट को गिरफ्तार किया था. पहले महाराष्ट्र सरकार ने इन दोनों मामलों की जांच केंद्रीय एजेंसी NIA को सौंप दिया था. गृह राज्य मंत्री अनिल देशमुख ने सीएम के इस फैसले पर सार्वजनिक तौर पर आपत्ति भी जाहिर की थी. शरद पवार ने भी कहा था कि ये मामला राज्य का है.

THACKERAY
आदित्य ठाकरे, उद्धव ठाकरे और शरद पवार


पवार भीमा कोरेगांव हिंसा की एनआईए के समानंतर एसआईटी की जांच कराना चाहते थे. एनसीपी चीफ की नाराजगी के बाद आखिरकार ठाकरे ने साफ किया कि एनआई को सिर्फ एल्गार परिषद का केस सौंपा गया है. भीमा-कोरेगांव की जांच महाराष्ट्र पुलिस के पास ही है.

एनसीपी के अलावा कांग्रेस के नेता भी शिवसेना के प्रति अपनी नाराजगी जता चुके हैं. हालांकि, बाद में दोनों पार्टी नेतृत्व की ओर से कहा गया कि हालात काबू में हैं और सरकार में सबकुछ ठीक है. क्योंकि सत्ता एक ऐसी दवा है, जो कई तरह की दर्द (परेशानियों) में राहत देने का काम करती है.


बहरहाल देखना है कि क्या महाराष्ट्र की सत्ता में इतिहास एकबार फिर खुद को दोहराएगा और सत्ता का रिमोट कंट्रोल ठाकरे परिवार के पास ही रहेगा या फिर महाविकास अघाड़ी का भविष्य खतरे में हैं.

(धवल कुलकर्णी मुंबई के जर्नलिस्ट हैं और द कज़न्स ठाकरे: उद्धव, राज एंड द शेडो ऑफ देयर सेना' के लेखक हैं. ये उनके निजी विचार हैं.

(अंग्रेजी में पूरा आर्टिकल पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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First published: February 19, 2020, 11:54 AM IST
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