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OPINION: राष्ट्रीय राजनीति में शरद पवार के फिर चर्चा में आने के क्या हैं मायने?

एनसीपी के प्रमुख और दिग्‍गज राजनीतिज्ञ हैं शरद पवार. (Pic- PTI)
एनसीपी के प्रमुख और दिग्‍गज राजनीतिज्ञ हैं शरद पवार. (Pic- PTI)

बीजेपी के चाणक्यों को उन्हीं के सियासी खेल में हराने वाले शरद पवार (Sharad Pawar) के समर्थक दावा करते हैं कि उनके नेता महाराष्ट्र का सियासी परीक्षण राष्ट्रीय स्तर पर भी दोहरा सकते हैं. वे कहते हैं कि यूपीए प्रमुख न सही, लेकिन गैर-बीजेपी और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों को साथ लाने में उनके राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमता का फायदा मिल सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 14, 2020, 10:58 AM IST
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धवल कुलकर्णी
नई दिल्‍ली.
राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी के प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar) ने 12 दिसंबर को जन्‍मदिन मनाया. वह अब 80 साल के हो गए हैं. हाल ही में उनके नाम पर एक ग्रामीण विकास की स्‍कीम का नामकरण हुआ है. दिव्‍यांगों की मदद के लिए और बड़े स्‍तर पर भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के लिए डिजिटल प्‍लेटफॉर्म 'महा शरद' की शुरुआत हुई है. उनके ये जन्‍मदिन के तोहफे यह सुनिश्चित करेंगे कि उनका नाम इतिहास में दर्ज होगा, क्‍योंकि कुछ ही लोगों के नाम पर किसी योजना की शुरुआत की जाती है.

इसके अलावा ऐसी भी रिपोर्ट हैं, जो उनके जन्‍मदिन के बड़े तोहफों के रूप में हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि शरद पवार कांग्रेस की अंतरिम अध्‍यक्ष सोनिया गांधी की जगह यूपीए के चेयरमैन बन सकते हैं. हालांकि इन रिपोर्ट पर उन्‍होंने खुद विराम लगाया. लेकिन दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं जैसे शिवसेना के संजय राउत और कांग्रेस के सुशील कुमार शिंदे ने इस विचार का समर्थन किया है.

संभव है कुछ लोग ऐसा दावा करें कि टूटे विपक्ष को नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ने के लिए खड़ा करने के लिए महाराष्‍ट्र के इस राजनीतिज्ञ के पास लोकसभा में महज पांच ही सांसद हैं, लेकिन हमेशा से ऐसा ही रहा है. चौबीसों घंटे, सातों दिन एक राजनीतिज्ञ के रूप में जाने जाने वाले शरद पवार हमेशा ही अपने इस 'वजन' से ज्‍यादा चोट पहुंचाते हैं.
राजनीति में पवार का प्रारंभिक सफर तीन दिन के नवजात के रूप में 1940 में ही शुरू हो गया था, जब उनकी मां शारदाबाई उन्हें पालने में लेकर पुणे में जिला परिषद या स्‍थानीय निकाय चुनाव की एक मीटिंग में गई थीं. दिग्‍गज कांग्रेसी वाईबी चव्‍हाण के सानिध्‍य में शरद पवार ने 1967 में अपना पहला चुनाव बारामती से जीता था. वाईबी चव्‍हाण बाद में उप प्रधानमंत्री भी बने थे.



जब 1978 में वाईबी चव्‍हाण ने कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेस (यू) बनाई, तब पवार कांग्रेस (आई) के साथ गठबंधन सरकार में वसंतदादा पाटिल के नीचे उद्योग मंत्री थे. हालांकि शरद पवार ने 38 साल की उम्र में महाराष्‍ट्र के सबसे कम उम्र के मुख्‍यमंत्री बनने के लिए अपनी पार्टी तोड़ी और जनता पार्टी से गठबंधन के साथ किया. लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी के वापस सत्‍ता में लौटने पर यह सरकार निष्‍कासित कर दी गई.

विपक्ष में अपनी पार्टी कांग्रेस (सोशलिस्‍ट) को कांग्रेस (आई) के खिलाफ मजबूत करने की बजाय पवार ने 1986 में अपनी पार्टी का उसमें विलय कर दिया. ऐसे में मराठवाड़ा जैसे इलाकों में शिवसेना के राजनीतिक उदय की जमीन तैयार हुई. उस समय शिवसेना मुंबई और आसपास के इलाकों में ही सीमित थी. पवार की विश्‍वसनीयता पर उठने वाले सवालों में उनके करियर में लगभग हर दशक में राजनीतिक स्थितियों में नाटकीय परिवर्तन देखे गए. इनमें सोनिया गांधी के विदेशी होने का मुद्दा उठाने के बाद 1999 में कांग्रेस से हटाए जाने पर खुद की पार्टी एनसीपी का गठन करना. इसके महाराष्‍ट्र में सत्‍ता में आने के लिए फिर से कांग्रेस से हाथ मिलाना. 2009 लोकसभा चुनाव के लिए भी एनसीपी शिवसेना से गठबंधन की नाकाम कोशिश कर चुकी है. एनसीपी ने 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के साथ अपने गठबंधन को भी खत्‍म कर दिया था और बीजेपी का साथ दिया.

पवार के राजनीतिक सफर में 2019 की अलग पहचान है. उस समय हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने चुनावी जंग लड़ने से किनारा कर लिया तो पवार महाराष्‍ट्र में सत्‍तारूढ़ बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के खिलाफ आगे आगे और बड़ा धक्‍का दिया. इसके बाद बीजेपी को सत्‍ता से बाहर रखने के लिए शरद पवार मुख्‍यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्‍व में चल रही महाराष्‍ट्र की सत्‍तारूढ़ महा विकास आघाड़ी (एमवीए) सरकार के मुख्‍य निर्माता के तौर सामने आए. एमवीए में शामिल तीन बड़े दल कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना के अलावा निर्दलीय विधायकों व अन्‍य छोटी पार्टियों की विचारधारा भले ही अलग रही हो, लेकिन पवार ने सरकार को एक साथ जोड़कर चलाते रखने का काम किया है.

1978 में पवार ने सहयोगी दलों को साथ मिलाकर प्रगतिशील डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) का गठन किया था. अब ऐसा कहा जा रहा है कि एनसीपी प्रमुख ने ऐसा ही कुछ एक्‍सपेरीमेंट राष्‍ट्रीय स्‍तर पर करने की महत्‍वाकांक्षा रखी है. 1990 के दशक से अब तक कोशिशों के बावजूद गुरु चव्‍हाण की तरह पवार से भी प्रधानमंत्री की कुर्सी दूर ही रही. ऐसे में उन्‍हें 'बेस्‍ट प्राइम मिनिस्‍टर इंडिया नेवर हैड' यानी भारत को न मिल सका बेहतरीन प्रधानमंत्री तक कहा जाने लगा.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक धवल कुलकर्णी मुंबई में पत्रकार और 'द कजिंस ठाकरे: उद्धव, राज एंड एंड द शैडो ऑफ देयर सेनाज' के भी लेखक हैं.' उनके इस पूरे लेख को यहां Click करके पढ़ा जा सकता है.)
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