Bihar Elections 2020: सुशांत सिंह केस से बिहार में शिवसेना के लिए कांटों भरी होगी चुनावी राह

मराठी मानुस से हिंदुत्व की तरफ शिफ्ट हुई राजनीति में शिव सेना की राष्ट्रीय स्तर पर असफलता दुर्दशा को रेखांकित करती है.
मराठी मानुस से हिंदुत्व की तरफ शिफ्ट हुई राजनीति में शिव सेना की राष्ट्रीय स्तर पर असफलता दुर्दशा को रेखांकित करती है.

अब बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Elections 2020) में शिवसेना (Shiv Sena) इलेक्शन लड़ेगी. सवाल यही है कि मुंबई में बिहार के अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ( Sushant Singh Rajput) की मौत के मामले में नितीश कुमार द्वारा की गई न्याय की मांग को देखते हुए क्या शिवसेना की मुश्किलें कम हो पाएंगी?

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 16, 2020, 11:48 PM IST
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मुंबई. जब 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों द्वारा अयोध्या में बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) ढांचा गिराया गया, उस समय वहां मौजूद एक शिवसेना (Shiv Sena) नेता ने किस्सा सुनाया था. इसमें उन्होंने दिवंगत शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे (Bal Thackeray) की आक्रामक हिंदुत्व अपील के बारे में बताया. शिवसेना नेता के अनुसार वहां कुछ ऐसी अफवाहें थी कि जब मुगलकालीन बाबरी मस्जिद के गुम्बद गिराए जाएंगे तब बाल ठाकरे नाटकीय तरीके से वहां प्रवेश करेंगे. समय-समय पर दूर से जब भी हेलिकॉप्टर की आवाज आती, तब कारसेवक कहते कि बालाजी (बाल ठाकरे) आ गए. शिवसेना का यह नेता आगे चलकर मुंबई का मेयर भी बना था.

राम मंदिर आंदोलनों के दौरान बाल ठाकरे की कट्टर हिंदुत्व वाली छवि के बाद भी महाराष्ट्र के बाहर शिव सेना को कभी राजनीतिक जमीन हासिल नहीं हो पाई. बाल ठाकरे के रहते हुए भी ऐसा कभी नहीं हो पाया था. मराठी मानुस से हिंदुत्व की तरफ शिफ्ट हुई राजनीति में शिव सेना की राष्ट्रीय स्तर पर असफलता दुर्दशा को रेखांकित करती है. महाराष्ट्र के बाहर किसी राज्य विधानसभा में शिव सेना से सिर्फ पवन कुमार पांडे ही चुने गए. राम मंदिर आन्दोलन के दौरान उन्हें उत्तर प्रदेश के अकबरपुर से 1991 में उन्हें चुना गया.

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अब बिहार विधानसभा चुनाव में शिव सेना वहां चुनाव लड़ेगी. सवाल यही है कि मुंबई में बिहार के अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में नितीश कुमार द्वारा की गई न्याय की मांग को देखते हुए क्या शिव सेना की मुश्किलें कम हो पाएगी. नितीश सरकार ने सुशांत सिंह को न्याय दिलाने के लिए अभियान चला दिया था. जेडीयू-बीजेपी शासन का यह अभियान महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार और शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के खिलाफ था.



शिव सेना ने 2015 के चुनाव में 70 सीटों पर चुनाव लड़ 2.11 लाख वोट हासिल किये थे. पार्टी नेता इस बार ज्यादा सफलता की उम्मीद कर रहे हैं. उनका कहना है कि पार्टी कैडर और महाराष्ट्र सरकार ने लॉक डाउन में बिहार के मजदूरों को मानवीय आधार पर सहायता प्रदान की इसलिए चुनाव में सफलता मिलने की सम्भावना है.

शिव सेना का जन्म 1966 में नौकरियों के लिए मराठी बोलने वाले लोगों के मुकाबले के लिए हुआ था लेकिन 1980 तक आते-आते जनसांख्यिकी और आर्थिक वास्तविकताओं के बदलने के साथ यह कट्टर हिंदुत्व की पारी में बदल गई.

पारम्परिक पकड़ से अलग महाराष्ट्र में हिन्दी भाषियों और व्यापारिक समुदायों जैसे गुजराती, मारवाड़ी और जैन आदि पर महाराष्ट्र में शिव सेना की पकड़ मुंबई और महानगरीय क्षेत्र में हिंदुत्व से बनी. मुंबई जैसे महानगर में मराठी अल्पसंख्यक हैं और वहां हिंदुत्व को स्वीकार सिर्फ मराठी वोट बैंक के कारण किया गया. इससे प्रतिस्पर्धा के लिए खड़ी राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के लिए चुनौती पैदा हुई.


पिछले साल भगवा पार्टी बीजेपी के साथ नाता तोड़ कांग्रेस और एनसीपी जैसे सेक्युलर दलों के साथ महाराष्ट्र में शिव सेना द्वारा सरकार बनाने से मराठी बनाम हिंदुत्व संतुलन अधिक स्पष्ट होगा. शिवसेना के नेता स्वीकार करते हैं कि वे महाराष्ट्र से एक प्रांतीय पार्टी होने का टैग नहीं हटा पाए हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर इसकी संभावनाओं को प्रभावित करती हैं. शिव सेना का पलायन-विरोधी रुख भी उत्तरी राज्यों में जनता का समर्थन प्रभावित करता है. महाराष्ट्र के साथ भाषागत संस्कृति और अर्थव्यवस्था में साझेदार गोवा में भी शिव सेना अपना मैदान तैयार करने में असफल रही है.

हालांकि, शिवसेना ने सतीश प्रधान, चंद्रकांत खैरे, संजय निरुपम और संजय राउत जैसे नेताओं को दूसरे राज्यों में पार्टी के मामलों को संभालने के लिए नियुक्त किया है, लेकिन सूत्रों का मानना है कि नेताओं को मुंबई से पैराट्रूप करने की आदत ने समस्याओं को जन्म दिया है. इससे संगठन को उन क्षेत्रों में बढ़ने से भी रोका है जहां संभावना थी. उत्तर भारत में शिव सेना का नेतृत्व विनय शुक्ला सर कर रहे हैं जो महाराष्ट्र सरकार के पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे के हिन्दी ट्यूटर हैं.

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कई बार, उम्मीदवारों को शिवसेना प्रत्याशियों के रूप में चुनाव लड़ने की अनुमति देने के फैसले अन्य दलों के वोट शेयर काटने जैसे उद्देश्यों से प्रभावित थे. हालांकि गुजरात जैसे राज्यों में शिव सेना की सीटों का अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रही है. नेताओं ने स्वीकार किया है कि इसका श्रेय पार्टी की बड़ी अपील के बजाय स्थानीय कारणों के वोट पकड़ने की क्षमता को दिया जा सकता है.


शिवसेना के नेताओं का दावा है कि उनके अखिल भारतीय विस्तार में भाजपा के साथ लगभग तीन दशक के गठबंधन में बाधा उत्पन्न हुई, जिसमें पार्टी ने हाराष्ट्र में अपने सहयोगी के लिए राष्ट्रीय स्तर की राजनीति छोड़कर एक वरिष्ठ साथी की भूमिका निभाई.

शिवसेना अन्य राज्यों में सफलता के लिए स्थानीय मुद्दों के साथ हिंदुत्व का एक कॉकटेल बनाने की कोशिश करती है, ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा के स्टार राजनेताओं की हिंदुत्ववादी अपील को जोरदार तरीके से रोका जा सके.
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