महाराष्ट्र: फडणवीस का दोहरा वार, युवा चेहरों के बहाने BJP के ही दिग्गजों को किनारे लगा दिया
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महाराष्ट्र: फडणवीस का दोहरा वार, युवा चेहरों के बहाने BJP के ही दिग्गजों को किनारे लगा दिया
महाराष्ट्र में बढ़ते कोरोना केस पर देवेंद्र फडणवीस ने जताई चिंता.

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) विधानसभा परिषद चुनाव में अपने करीबियों को टिकट दिलाने में कामयाब रहे. इसके साथ ही उन्होंने एकनाथ खड़से, विनोद तावड़े और पंकजा मुंडे जैसे नेताओं को विधान परिषद पहुंचने से रोक दिया है.

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मुंबई.  भाजपा (BJP) के देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र (Maharashtra) में विरोधी पार्टियों से भले ही मात खा गए हों, लेकिन खुद की पार्टी में उनका रुतबा बढ़ता ही जा रहा है. फडणवीस ने राज्य में होने जा रहे विधानसभा परिषद चुनाव (Maharashtra Legislative Council) में ना सिर्फ अपने चहेतों को टिकट दिलाया है, बल्कि कद्दावर माने जाने वाले नेताओं को किनारे भी लगा दिया है. जिन नेताओं को कभी मुख्यमंत्री पद के लिए देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा था, वे विधान परिषद के काबिल भी नहीं समझे गए. महाराष्ट्र विधान परिषद के लिए 21 मई को मतदान होगा.

युवाओं को आगे बढ़ाकर सीनियर नेताओं को किनारे लगाने का खेल राजनीति में बेहद आम, लेकिन बेहद खतरनाक भी माना जाता है. पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र अपनी इसी बाजी से एकनाथ खड़से (Eknath Khadse), विनोद तावड़े (Vinod Tawde), पंकजा मुंडे (Pankaja Munde) और चंद्रशेख्रर बावनकुले जैसे नेताओं को विधान परिषद पहुंचने से रोक दिया है. भाजपा ने विधान परिषद के लिए गोपीचंद पडलकर, प्रवीण दटके, डॉ. अजित गोपछडे, रणजीत सिंह मोहिते पाटील को उम्मीदवार घोषित किया है. ये चारों ही फडणवीस के करीबी माने जाते हैं. फडणवीस ने इससे पहले विधान परिषद में अपने करीबी प्रवीण दाड़ेकर को नेता प्रतिपक्ष का पद दिलाया था.

यह सिर्फ संयोग नहीं है कि जिन एकनाथ खड़से और पंकजा मुंडे को कभी सीएम पद के लिए दावेदार बताया जा रहा था, वे विधान परिषद से भी बाहर रहेंगे. एकनाथ खडसे ने तो यह बात मानी भी थी कि उन्होंने उच्च सदन के लिए सीट मांगी थी. यह भी कहा जा रहा था कि पंकजा मुंडे विधान परिषद पहुंचकर प्रवीण दाड़ेकर की जगह नेता प्रतिपक्ष बन सकती हैं.
देवेंद्र फडणवीस ने एक तीर से दो शिकार करते हुए ना सिर्फ अपने प्रतिद्वंद्वियों को किनारे लगाया, बल्कि अपने साथी भी बढ़ा लिए. खास बात यह कि उन्होंने ऐसा करते समय महाराष्ट्र राजनीति के जातीय समीकरण को भी साध लिया है. जिन चार युवाओं को मौका दिया गया है, उनमें से तीन ओबीसी वर्ग से आते हैं और एक मराठा समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं.
गोपीचंद पडलकर विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा में शामिल हुए हैं. इससे पहले वे प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन अगाड़ी में थे. फडणवीस उन्हें बीजेपी में लेकर आए और विधानसभा चुनाव में टिकट दिलाया. हालांकि, वे अजित पवार से चुनाव हार गए. पडलकर ओबीसी समाज से आते हैं. रणीजत सिंह मोहिते पाटिल पूर्व उप मुख्यमंत्री विजय सिंह मोहिते पाटिल के बेटे हैं. माना जाता है कि सोलापुर इलाके में उनकी पकड़ अच्छी है. प्रवीण दटके को फडणवीस की तरह नागपुर के मेयर रह चुके हैं. इस ओबीसी नेता को फडणवीस के साथ-साथ संघ का भी करीबी बताया जाता है. डॉ. अजित गोपछडे को इस चुनाव का डार्क हॉर्स कहा जा सकता है. मेडिकल क्षेत्र से आने वाले गोपछड़े वीरशैव-लिंगायत समुदाय से आते हैं, जिनकी मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में खासा असर है.



बीजेपी के एक सीनियर नेता ने कहा कि पडलकर और मोहित पाटिल को टिकट दिए जाने से पार्टी के एक वर्ग में गुस्सा भी था. कुछ नेता मानते हैं कि फडणवीस जो 2014 में अचानक सीएम बना दिए गए थे, उन्होंने अपने पांच साल के कार्यकाल में कई विरोधियों को किनारे लगाया है. एक नेता ने कहा, ‘हाल के दिनों में पार्टी में कुछ लोगों को अचानक महत्व के पदों में बैठा दिया गया है, इससे बाकी लोगों में बड़ा असंतोष है. यह तय है कि आज नहीं तो कल, हमें इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी. पंकजा को इस आधार पर टिकट नहीं दिया गया कि वे पिछला चुनाव हार गई थीं, लेकिन यही तर्क उनके लिए नहीं दिए गए, जिन्हें टिकट मिले हैं.’

भविष्य में जो भी हो, शुक्रवार को विधान परिषद चुनाव के लिए उम्मीदवारी के ऐलान ने यह तय कर दिया है कि महाराष्ट्र की भाजपा इकाई में सारे फैसले फडणवीस ही ले रहे हैं. इससे यह भी साफ है कि केंद्रीय नेतृत्व की नजर में वे गुड बुक्स में बने हुए हैं.

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