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मुफ्त में भोजन और रहने की सुविधा देने से बढ़ेगी बेघरों की संख्या: बॉम्बे हाईकोर्ट

शनिवार को बीएमसी के वकील ने सहायक आयुक्त (योजना) द्वारा एक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने शनिवार को एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए ये भी कहा कि ये जरूरी है कि ऐसे लोगों को इस सुविधाओं के बदले देश के लिए काम करने को कहा जाए.

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    मुंबई. बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने कहा कि मुफ्त में खाना-पीना और रहने की सुविधा उपलब्ध कराने से बेघरों, भिखारियों और फुटपाथ पर रहने वालों की आबादी बढ़ सकती है. हाई कोर्ट ने ये बातें शनिवार को एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कही. हाई कोर्ट ने ये भी कहा कि ये जरूरी है कि ऐसे लोगों को इस सुविधाओं के बदले देश के लिए काम करने को कहा जाए. कोर्ट में बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) ने कहा कि उसने सरकारी संगठनों की मदद से बेघर लड़कियों को भोजन के पैकेट, पीने योग्य पानी और सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने के लिए अलग-अलग उपाय किए हैं.

    अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक हाईकोर्ट ने ये बातें एनजीओ पहचान के संस्थापक अध्यक्ष बृजेश आर्य की तरफ से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कही. ये NGO बेघरों के लिए काम करती है. NGO की तरफ से वकील क्रांति एलसी ने हाई कोर्ट से राज्य और सभी सरकारी तंत्रों को बेघरों के लिए आश्रय के निर्माण को पूरा करने के लिए निर्देश देने की मांग की. साथ ही उनकी तरफ से मांग की गई कि ऐसे लोगों को महामारी के दौरान दिन में तीन बार पका हुआ भोजन, सार्वजनिक शौचालयों, पीने योग्य पानी, साबुन और महिलाओं के लिए सैनिटरी नैपकिन उपल्बध कराई जाएं.

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    हाईकोर्ट ने और क्या कहा?
    मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी की पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, 'अगर बेघरों को आश्रय प्रदान किया जाता है तो उन्हें देश के लिए काम करना चाहिए. सरकारी योजनाओं के तहत उनके लिए रोजगार या आजीविका प्रदान की जाती है. सब कुछ सरकार द्वारा नहीं किया जा सकता है. अगर ऐसा हुआ तो उनकी संख्या बढ़ जाएगी. आप बस आबादी को बढ़ाने के लिए इन्हें प्रोत्साहित कर रहे हैं.'

    मुफ्त में मिले सार्वजनिक शौचालय की सुविधा
    शनिवार को बीएमसी के वकील ने सहायक आयुक्त (योजना) द्वारा एक दस्तावेज प्रस्तुत किया, जिसमें नागरिक प्राधिकरण, नेस वाडिया फाउंडेशन, रामकृष्ण मिशन और अन्य द्वारा शहर में बेघरों को वितरित किए जा रहे भोजन के पैकेटों की संख्या और नैपकिन के वितरण के बारे में बताया गया. अदालत ने अधिकारियों की पहल की सराहना करते हुए राज्य और नागरिक प्राधिकरण को सार्वजनिक शौचालयों का मुफ्त उपयोग करने का फैसला करने के लिए कहा. कोर्ट की दलील थी कि कुछ बेघर और भिखारी पैसे नहीं दे सकते हैं.

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