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भीमा कोरेगांव केस : मुंबई पुलिस ने दायर किया शपथपत्र, सुनवाई 11 दिसंबर तक के लिए टली

भीमा कोरेगांव केस : मुंबई पुलिस ने दायर किया शपथपत्र, सुनवाई 11 दिसंबर तक के लिए टली

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

एफिडेविट के जरिए कहा गया है कि महाराष्‍ट्र सरकार कार्यकर्ताओं की निंदा करती है. उन्‍होंने कहा कि आज के दौर में व्‍यवक्‍तिगत स्‍वतंत्रता के नाम पर रोना एक फैशन बन गया है.

    भीमा कोरेगांव मामले में सोमवार को हुई सुनवाई के दैरान महाराष्‍ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र दायर कर दिया है. इस शपथपत्र के जरिए कहा गया है कि महाराष्‍ट्र सरकार, इस मामले में नजरबंद किए गए कार्यकर्ताओं की निंदा करती है. उन्‍होंने कहा कि आज के दौर में व्‍यवक्‍तिगत स्‍वतंत्रता के नाम पर रोना एक फैशन बन गया है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई 11 दिसंबर के लिए टाल दी है.

    सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को कोरेगांव-भीमा हिंसा मामले में पुणे कोर्ट के समक्ष गिरफ्तार कार्यकर्ताओं के खिलाफ दायर चार्जशीट जमा करने का निर्देश दिया है. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वह आरोपी के खिलाफ "आरोप" देखना चाहते हैं और महाराष्ट्र सरकार के सामने उपस्थित वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी से 8 दिसंबर तक राज्य पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट में जमा करने के लिए कहा है.

    भीमा-कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किए गए पांच कार्यकर्ताओं में शामिल गौतम नवलखा के रिमांड के संबंध में दायर शपथपत्र में मुंबई पुलिस ने कहा कि अब लोग व्‍यवक्‍तिगत स्‍वतंत्रता के नाम पर मनमानी कर रहे हैं. हमने इस मामले में जिन आरोपियों पर कार्रवाई की है वह कानून को ध्‍यान में रखकर ही की गई है. महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि आरोपी सुरेंद्र गडलिंग और अन्य व्यक्तियों के खिलाफ आरोप बहुत गंभीर हैं और उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती.

    क्या थी भीमा-कोरेगांव हिंसा?
    भीम-कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले में है. इस छोटे से गांव से मराठा का इतिहास जुड़ा है. 200 साल पहले यानी 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कपंनी की सेना ने पेशवा की बड़ी सेना को कोरेगांव में हरा दिया था. पेशवा की सेना का नेतृत्व बाजीराव II कर रहे थे. बाद में इस लड़ाई को दलितों के इतिहास में एक खास जगह मिल गई. बीआर आंबेडकर को फॉलो करने वाले दलित इस लड़ाई को राष्ट्रवाद बनाम साम्राज्यवाद की लड़ाई नहीं कहते हैं. दलित इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं. उनके मुताबिक, इस लड़ाई में दलितों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी.

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    इस साल जनवरी में यहां क्या हुआ था और क्यों भिड़की थी हिंसा?
    साल 2018 इस युद्ध का 200वां साल था. ऐसे में इस बार यहां भारी संख्या में दलित समुदाय के लोग जमा हुए थे. जश्न के दौरान दलित और मराठा समुदाय के बीच हिंसक झड़प हुई थी. इस दौरान इस घटना में एक शख्स की मौत हो गई, जबकि कई लोग घायल हो गए थे. इस बार यहां दलित और बहुजन समुदाय के लोगों ने 'एल्गार परिषद' के नाम से शनिवार वाड़ा में कई जनसभाएं की. शनिवार वाड़ा 1818 तक पेशवा की सीट रही है. जनसभा में मुद्दे हिन्दुत्व राजनीति के खिलाफ थे. इस मौके पर कई बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाषण भी दिए थे और इसी दौरान अचानक हिंसा भड़क उठी.

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    Tags: CPI Maoist, Maharashtra, Mumbai, Naxal terror, Supreme Court

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