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Explained: क्या एक हिंदू पुरुष दो महिलाओं से शादी कर सकता है? महाराष्‍ट्र में हुई शादी के बाद उठा सवाल, जानें क्‍या कहता है कानून

महाराष्‍ट्र में हिंदू पुरूष के दो महिलाओं से शादी करने के बाद   यह सवाल चर्चा में है कि क्‍या ऐसा करना वैध है?

महाराष्‍ट्र में हिंदू पुरूष के दो महिलाओं से शादी करने के बाद यह सवाल चर्चा में है कि क्‍या ऐसा करना वैध है?

महाराष्‍ट्र (Maharashtra) में जुड़वां महिलाओं के साथ एक हिंदू पुरूष की शादी का वीडियो सोशल मीडिया (Social media) पर वाय ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

महाराष्‍ट्र में जुड़वां महिलाओं से हुई एक युवक की शादी पर उठे सवाल
क्‍या ऐसी शादी को भारत का कानून देता है स्‍वीकृति, क्‍या ये वैध है?
विवाह को लेकर भारत में एक कानून नहीं, अलग-अलग कानून का पालन

नई दिल्‍ली. महाराष्ट्र में एक शख्स से शादी करने वाली दो जुड़वां बहनों की वीडियो क्लिप आजकल सुर्खियां बटोर रही है. यह शादी भले ही दूल्हा और दुल्हन के परिवारों की सहमति से हुई है, लेकिन अब इस मामले में दूल्हे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है. रिपोर्ट के अनुसार, सोलापुर जिले के अकलुज पुलिस स्टेशन में दूल्हे के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 494 (पति या पत्नी के जीवनकाल में फिर से शादी करना) के तहत एक गैर-संज्ञेय (एनसी) अपराध दर्ज किया गया है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 16, जिसे 1948 में अपनाया गया था, दोनों व्यक्ति के विवाह के अधिकार को स्वीकार करते हैं.

भारत में, विवाह को नियंत्रित करने वाली कोई एक समान कानून संहिता नहीं है; बल्कि अलग-अलग धर्म अलग-अलग कानूनों का पालन करते हैं. हिंदुओं के लिए 1955 से हिंदू विवाह अधिनियम, मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937, ईसाइयों के लिए भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872 और पारसियों के लिए पारसी विवाह व तलाक अधिनियम 1936 है. इसके अलावा 1954 का विशेष विवाह अधिनियम उन लोगों के बीच विवाह को विनियमित करने के लिए पारित किया गया था, जो किसी विशेष धार्मिक परंपरा से नहीं जुड़े थे.

हिंदू संस्कृति द्विविवाह की प्रथा का समर्थन नहीं करती                                                                1955 में हिंदू विवाह अधिनियम के पारित होने के साथ हिंदुओं के बीच वैवाहिक कानून को संहिताबद्ध किया गया था. यह अधिनियम उन लोगों पर लागू होता है जो हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म का पालन करते हैं. अधिनियम विवाह करने की क्षमता बताता है और इन शर्तों का उल्लेख धारा 5 में किया गया है, जो कहती है कि विवाह के समय कोई जीवनसाथी जीवित नहीं होना चाहिए. इसका मतलब यह है कि हिंदू विवाह अधिनियम द्विविवाह की प्रथा का समर्थन नहीं करती है. विवाह के समय दूल्हा और दुल्हन को स्वस्थ दिमाग का होना चाहिए, अपनी स्वतंत्र सहमति देनी चाहिए और पागल नहीं होना चाहिए.

सगे संंबंधियों के बीच शादी नहीं हो सकता                                                                             लीगल सर्विसेज इंडिया की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों पक्षों ( दूल्‍हा-दुल्‍हन) की आयु कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए, किसी भी स्तर पर एक दूसरे से संबंधित नहीं होना चाहिए, जो एक निषिद्ध संबंध का गठन करता है और वह किसी भी तरह से संबंधित नहीं है, जो एक सपिंड (चचेरे भाई) संबंध का गठन करेगा.

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 17 में द्विविवाह की सजा का प्रावधान है. ‘इंडियन कानून’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘इस अधिनियम के प्रारंभ होने के बाद संपन्न दो हिंदुओं के बीच कोई भी विवाह शून्य है, यदि इस तरह की शादी की तारीख में किसी भी पक्षकार का पति या पत्नी जीवित था; और भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 494 और 495 के प्रावधान तदनुसार लागू होंगे.’

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