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यौन उत्पीड़न को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले से अचरज में बाल अधिकार एक्टिविस्ट्स, पूछा-कैसे समझाएं यह निर्णय

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 19 जनवरी को दिए फैसले में कहा था कि त्वचा से त्वचा का संपर्क हुए बिना नाबालिग पीड़िता का स्तन स्पर्श करना, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम (पोक्सो) के तहत यौन हमला नहीं कहा जा सकता.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 19 जनवरी को दिए फैसले में कहा था कि त्वचा से त्वचा का संपर्क हुए बिना नाबालिग पीड़िता का स्तन स्पर्श करना, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम (पोक्सो) के तहत यौन हमला नहीं कहा जा सकता.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 19 जनवरी को दिए फैसले में कहा था कि त्वचा से त्वचा का संपर्क हुए बिना नाबालिग पीड़िता का स्तन स्पर्श करना, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम (पोक्सो) के तहत यौन हमला नहीं कहा जा सकता.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 26, 2021, 1:12 PM IST
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राखी बोस


मुंबई. किसी नाबालिग को निर्वस्त्र किए बिना, उसके स्तनों को छूना, यौन हमला नहीं कहा जा सकता. बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि इस तरह का कृत्य पोक्सो अधिनियम के तहत यौन हमले के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता. बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने 19 जनवरी को पारित एक आदेश में कहा कि यौन हमले का कृत्य माने जाने के लिए 'यौन मंशा से त्वचा से त्वचा का संपर्क होना' जरूरी है.

उन्होंने अपने फैसले में कहा कि महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है. जस्टिस गनेडीवाला ने एक सत्र अदालत के फैसले में संशोधन किया जिसने 12 वर्षीय लड़की का यौन उत्पीड़न करने के लिए 39 वर्षीय व्यक्ति को तीन वर्ष कारावास की सजा सुनाई थी. अभियोजन पक्ष और नाबालिग पीड़िता की अदालत में गवाही के मुताबिक, दिसंबर 2016 में आरोपी सतीश नागपुर में लड़की को खाने का कोई सामान देने के बहाने अपने घर ले गया.
हाईकोर्ट के फैसले से नाराज लोग


हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह दर्ज किया कि अपने घर ले जाने पर सतीश ने उसके वक्ष को पकड़ा और उसे निर्वस्त्र करने की कोशिश की. हाईकोर्ट ने कहा, चूंकि आरोपी ने लड़की को निर्वस्त्र किए बिना उसके सीने को छूने की कोशिश की, इसलिए इस अपराध को यौन हमला नहीं कहा जा सकता है और यह भादंसं की धारा 354 के तहत महिला के शील को भंग करने का अपराध है. धारा 354 के तहत जहां न्यूनतम सजा एक वर्ष की कैद है, वहीं पोक्सो कानून के तहत यौन हमले की न्यूनतम सजा तीन वर्ष कारावास है.

बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले पर समाज के बड़े वर्ग में नाराजगी है. एक ओर जहां महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा है कि इस मामले में संस्था सुप्रीम कोर्ट जाएगी तो वहीं कार्यकर्ताओं और बाल अधिकार निकायों ने भी बॉम्बे हाईकोर्ट फैसले की आलोचना की है.

'इस निर्णय पर को हम कैसे समझाएं?'
HAQ सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स की कार्यकारी निदेशक भारती अली ने News18 को बताया, 'यह कहना बेतुका है कि यौन उत्पीड़न कपड़ों के ऊपर से नहीं हो सकता. सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़ का शिकार होने वाली महिलाओं के बारे में सोचें. किसी लड़की को ज़बर्दस्ती छूने के मामले इस प्रकार की एक परिभाषा सिर्फ अनुचित ही नहीं हानिकारक भी है कि क्योंकि इससे भविष्य के मामले प्रभावित हो सकते हैं.

बाल सुरक्षा वकील अनंत अस्थाना News18 को बताया- 'POCSO की धारा 8 में शारीरिक संपर्क का जिक्र है लेकिन कानून में प्रावधान का वर्णन नहीं है कि शारीरिक संपर्क क्या है. ऐसे में कानून की यह व्याख्या खतरनाक है क्योंकि इसका मतलब है कि यौन हमला केवल बिना कपड़ों के हो सकता है.'

चाइल्ड एब्यूज के खिलाफ 1मिलियन की संस्थापक प्राणधिका ने कहा कि  'भारत में एक युवा लड़की को य़ह समझाने की कल्पना करें कि अगर कोई आदमी उसके कपड़ों के नीचे उसे जबरन छूता है तो यह हमला होगा लेकिन अगर वह उसके टॉप या पैंट के ऊपर ऐसा करता है, तो ऐसा नहीं  होगा. यह कैसे समझाएं?'

News18 से बात करते हुए, सेव द चिल्ड्रन में बाल संरक्षण प्रमुख, प्रभात कुमार ने कहा कि फैसले से बच्चों की एजेंसी को यौन अपराधों की रिपोर्ट करने में और बाधा होगी. हमने देखा है कि नाबालिगों के साथ हुए यौन अपराधों और यहां तक कि उनके परिवारों को लेकर रिपोर्ट करना कितना मुश्किल है. कानून की ऐसी व्याख्या आगे चलकर बच्चों में होने वाले भय और चिंता को बढ़ाती है. वह यह नहीं समझ पाएंगे कि गुड टच या बैड टच क्या है?' (भाषा इनपुट के साथ)
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