मुंबई: सावधान! फर्जी वैक्सीनेशन के शिकार हुए 2 हज़ार से ज्यादा लोग, FIR दर्ज

कोरोना वैक्‍सीन (File pic)

Fake Vaccination camp: हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार और निगम अधिकारियों को इस बीच पीड़ितों में फर्जी टीकों के दुष्प्रभाव का पता लगाने के लिए उनकी जांच करवाने के लिए कदम उठाने चाहिए.

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    मुंबई.  कोरोना वायरस को मात देने के लिए इन दिनों देशभर में बड़े पैमाने पर लोगों को वैक्सीन (Covid-19 Vaccine) लगाई जा रही है. लेकिन इस आपदा की घड़ी में भी लोग अवसर तलाश लेते हैं. कुछ ऐसा ही मामला मुंबई से आया है. यहां दो हज़ार से ज़्यादा लोग फर्जी वैक्सीनेश कैंप (Fake vaccination camp) का शिकार हो गए. फर्जी वैक्सीन को लेकर ये जानकारी खुद महाराष्ट्र की सरकार ने बंबई हाईकोर्ट को दी है. अब हाईकोर्ट ने इस मामले को लेकर राज्य सरकार और BMC को नई गाइडलाइन जारी करने को कहा है जिससे कि लोग दोबारा ऐसी घटनाओं का शिकार न हो सके.

    राज्य सरकार के वकील दीपक ठाकरे ने अदालत को बताया कि शहर में अब तक कम से कम नौ फर्जी शिविरों का आयोजन किया गया और इस सिलसिले में चार अलग-अलग FIR दर्ज की गई हैं. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जी एस कुलकर्णी की पीठ को महाराष्ट्र सरकार की तरफ से बताया गया कि पुलिस ने अब तक 400 गवाहों के बयान दर्ज किए हैं. फिलहाल डॉक्टरों की तलाश जारी है. बता दें कि कांदीवली की एक आवासीय सोसाइटी में फर्जी टीकाकरण शिविर लगा था, उसी मामले में एक डॉक्टर आरोपी है.

    टीकों के दुष्प्रभाव का पता लगाने का आदेश
    हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार और निगम अधिकारियों को इस बीच पीड़ितों में फर्जी टीकों के दुष्प्रभाव का पता लगाने के लिए उनकी जांच करवाने के लिए कदम उठाने चाहिए. कोर्ट ने कहा, ‘हमारी चिंता इस बात को लेकर है कि टीका लगवाने वाले इन लोगों के साथ क्या हो रहा है. उन्हें क्या लगाया गया और फर्जी टीके का क्या असर पड़ा?’

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    इन जगहों पर हुआ फर्जीवाड़ा
    सरकार के मुताबिक 25 मई को मलाड में 30 लोगों को फर्जी वैक्सीन लगाई गई. अगले दो दिन बाद ठाणे में 122 और फिर बोरिवली में 514 लोगों को वैक्सीन की डोज़ लगाई गई. अदालत ने बीएमसी और राज्य सरकार से कहा कि वे इस मामले में सुनवाई की अगली तारीख 29 जून को अदालत के सवालों और निर्देशों से संबंधित जवाब के साथ अपने हलफनामे दाखिल करें.

    कुछ तो गड़बड़...
    BMC की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल साखरे ने बताया, ‘‘हमें पता चला है कि जिस दिन लोगों को फर्जी टीका लगाए गए, उन्हें टीकाकरण प्रमाण-पत्र उसी दिन नहीं दिए गए. बाद में ये प्रमाण-पत्र तीन अलग-अलग अस्पतालों के नाम पर जारी किए गए. तब जाकर लोगों को यह अहसास हुआ कि कहीं कुछ गड़बड़ है.

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