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शिवसेना की आक्रामकता से उलट शांत दिखने वाले उद्धव ठाकरे ने अपने सियासी विरोधियों को कैसे किया चित?

शिवसेना की आक्रामकता से उलट शांत दिखने वाले उद्धव ठाकरे ने अपने सियासी विरोधियों को कैसे किया चित?

उद्धव ठाकरे को शिवसेना के आक्रामक रुख के उलट नरम रवैये के लिए पहचाना जाता है. लेकिन, उन्‍होंने पार्टी पर नियंत्रण के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं और जीतीं भी.

उद्धव ठाकरे को शिवसेना के आक्रामक रुख के उलट नरम रवैये के लिए पहचाना जाता है. लेकिन, उन्‍होंने पार्टी पर नियंत्रण के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं और जीतीं भी.

शिवसेनाप्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) अपने पिता बाल ठाकरे (Bal Thackeray) व चचेरे भाई राज ठाकरे (Raj Thackeray) की तरह न तो आक्रामक वक्‍ता हैं और न ही उनका व्‍यक्तित्‍व दोनों के बराबर करिश्‍माई माना जाता है. उद्धव को एक खुले दिमाग के नेता के तौर पर पहचाना जाता है. उन्‍हें धीमे लेकिन लगातार चलते हुए लक्ष्‍य हासिल करने वाला नेता माना जाता है. 

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    धवल कुलकर्णी

    मुंबई. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को लेकर कई गलत धारणाएं हैं. उन्‍हीं में एक है कि वह अपनी इच्‍छा के खिलाफ राज‍नीति में उतरने को मजबूर हुए. हालांकि, कई ऐसी घटनाएं हैं जो इस धारणा को झुठलाती हैं. ये हो सकता है कि उनका व्‍यक्तिगत और राजनीतिक व्‍यक्तित्‍व एकदम अलग हो. ये सही है कि वह शिवसेना के आक्रामक रुख के उलट शांत नजर आते हैं. लेकिन, उन्‍हें करीब से जानने वाले लोगों का दावा है कि उद्धव मंझे हुए राजनेता हैं. उद्धव ठाकरे को सभ्‍य और शांत व्‍यक्ति के तौर पर पहचाना जाता है. लेकिन, उन्‍होंने शिवसेना पर नियंत्रण हासिल करने के लिए कई अंदरूनी लड़ाइयां लड़ीं और जीती हैं. एक बार तो वह अपने पिता बाल ठाकरे (Bal Thackeray) के ही विरुद्ध खड़े हो गए थे. शिवसेना (Shiv Sena) से 2005 में अलग होकर 2006 में अपनी अलग पार्टी मनसे (MNS) बनाने वाले चचेरे भाई राज ठाकरे (Raj Thackeray) से भी उद्धव की लंबी अदावत चली थी. शिवसेना जब 1985 में बृहन्‍मुंबई म्‍युनिसिपल कॉरपोरेशन (BMC) की सत्‍ता पर काबिज हुई, तब 1960 में जन्‍मे उद्धव ने जमकर पार्टी का प्रचार किया था. जेजे इंस्‍टीट्यूट ऑफ अप्‍लाइड आर्ट से ग्रेजुएट उद्धव ने दोस्‍तों के साथ मिलकर एक एड एजेंसी (Ad Agency) भी शुरू की थी.

    उद्धव ने 'सामना' की लॉन्चिंग में निभाई थी बड़ी भूमिका
    शिवसेना ने 1989 में जब पार्टी का मुखपत्र (Mouthpiece) 'सामना' शुरू किया था, तब उद्धव ठाकरे ने इसकी लॉन्चिंग में बड़ी भूमिका निभाई थी. बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने 1988 में शिवसेना की भारतीय विद्यार्थी सेना (BVS) के अध्‍यक्ष का पद संभाला. इसके बाद जल्‍द ही राज को बाल ठाकरे का भविष्‍य का उत्‍तराधिकारी माना जाने लगा. तब राज ठाकरे महज 20 साल के थे. वहीं, उद्धव अप्रैल 1990 में मुंबई के उपनगर मुलुंड में शिवसेना के एक कार्यक्रम में मौजूद थे. इस कार्यक्रम को ही राजनीति में उद्धव का औपचारिक पदार्पण माना जाता है. राजनीति में उनके उतरने का समय महज संयोग नहीं था. राज ठाकरे ने 1993 में बेरोजगारी के खिलाफ नागपुर में एक रैली की थी.

    राज ठाकरे ने 1993 में बेरोजगारी के खिलाफ नागपुर रैली की. रैली से एक रात पहले मातोश्री से एक फोन ने दोनों में तनाव बढ़ा दिया. 


    नागपुर रैली से शुरू हुआ शिवसेना के दो धड़ों में तनाव
    राज ठाकरे को तेजतर्रार और ईमानदार नेता के तौर पर जाना जाता था. हालांकि, शिवसेना का एक वर्ग उनकी इस शैली के खिलाफ था. इसी धड़े ने नरम उद्धव को पार्टी में आगे बढ़ाने की मांग शुरू कर दी. राज ठाकरे ने दिसंबर, 1993 में बेरोजगारी के मुद्दे पर नागपुर में विधानसभा के सामने मोर्चा निकाला. रैली से एक रात पहले पार्टी आलाकमान ने राज ठाकरे से कहा कि कार्यक्रम में उद्धव का भाषण भी सुनिश्चित कराया जाए. इस पर राज उखड़ गए. उन्‍हें लगा कि वह कड़ी मेहनत कर रहे हैं और पार्टी के आगे बढ़ने का श्रेय उद्धव ठाकरे को मिल रहा है. इसके बाद दोनों धड़ों में शुरू हुआ तनाव बढ़ते-बढ़ते अंदरूनी जंग में तब्‍दील हो गया.

    रमेश किनी की मौत ने राज को हाशिए पर धकेल दिया
    शिवसेना की अंदरूनी लड़ाई का नतीजा यह निकला कि राज ने 2006 में महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली. कुछ लोगों का कहना है कि इसकी शुरुआत 1995 से ही हो गई थी. जुलाई, 1996 में मुंबई के एक व्‍यक्ति रमेश किनी की मौत के लिए राज और उनके साथियों को दोषी ठहराया गया. उस समय शिवसेना-भाजपा राज्य में शासन कर रहे थे. राज विवादों में घिरते चले गए, जिसे सीबीआई की पूछताछ ने हवा दी. इससे राज राजनीति में हाशिए पर चले गए. इसी दौरान बाल ठाकरे की पत्‍नी मीनाताई और बड़े बेटे बिंदुमाधव का निधन हो गया. उनसे छोटे बेटे जयदेव से शिवसेना प्रमुख का मनमुटाव चल रहा था. इससे उद्धव पर उनकी निर्भरता बढ़ती चली गई.

    खुद राज ने उद्धव के नाम का प्रस्‍ताव पेश किया
    उद्धव ठाकरे ने 1997 के मुंबई महानगरपालिका के चुनावों में सक्रिय भूमिका निभाई. इसके बाद बाल ठाकरे ने 2002 के मुंबई महानगरपालिका की जिम्मेदारी पूरी तरह से उद्धव को सौंप दी. कहा जाता है कि उस चुनाव में राज के समर्थकों को टिकट नहीं दिया गया. इसके बाद भी राज ठाकरे के करीबियों को किनारे रखने का सिलसिला जारी रहा. जनवरी, 2003 में शिवसेना का पार्टी सम्मेलन महाबलेश्वर में था. सम्मेलन के आखिरी दिन बाल ठाकरे की गैरमौजूदगी में खुद राज ने उद्धव का नाम पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया. इसी के साथ आधिकारिक घोषणा हो गई कि उद्धव ठाकरे ही बाल ठाकरे के राजनीतिक उत्तराधिकारी होंगे. बाल ठाकरे का कहना था कि उन्‍हें राज के फैसले की पहले से कोई जानकारी नहीं थी. हालांकि, मनसे प्रमुख के सार्वजनिक बयान कुछ और ही कहानी बयान करते हैं.

    बाल ठाकरे ने 2012 में आखिरी जनसभा में पार्टी कार्यकर्ताओं से उद्धव और आदित्‍य के साथ खड़े रहने की अपील की.


    बाल ठाकरे ने उद्धव का साथ देने की अपील की
    उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे, महाराष्‍ट्र के पूर्व मुख्‍यमंत्री नारायण राणे और भाई जयदेव की पत्‍नी स्मिता को किनारे लगाकर शिवसेना की बागडोर अपने हाथों में ले ली. बाद में राणे ने कहा कि बाल ठाकरे के पुत्र प्रेम ने सब बर्बाद कर दिया. विरोधी आरोप लगाते हैं कि उद्धव ठाकरे को उनकी राजनीतिक विरासत प्‍लेट में सजाकर सौंप दी गई. बाल ठाकरे ने 2012 में अपने निधन से पहले आखिरी जनसभा में पार्टी कार्यकर्ताओं से उद्धव और आदित्‍य के साथ खड़े रहने की अपील की. बाल ठाकरे के मुकाबले उद्धव से मिलना आसान नहीं है. जहां बाल ठाकरे पार्टी काडर से सीधे मुलाकात करते थे. वहीं, उद्धव से मुलाकात के लिए उनके पीए मिलिंद नर्वेकर से समय मांगना पड़ता है. महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव 2004 में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन हार गया. राणे 2005 में पार्टी छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए.

    कांग्रेस नेताओं जैसा है उद्धव ठाकरे का व्‍यक्तित्‍व
    शिवसेना से राणे और राज के अलग होने के बाद उद्धव को मुंबई नगरपालिका की सत्ता पर कब्‍जा बनाए रखने और विधायकों को एकजुट रखने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा. लेकिन, उद्धव ने इस पर सफलता पाई. उन्होंने दिखा दिया कि वह पार्टी को एकजुट रख सकते हैं. वहीं, 2014 में मोदी लहर होने के बावजूद विधानसभा चुनाव में उद्धव के नेतृत्व में शिव सेना ने 63 सीटें जीतीं थी. उद्धव का व्यक्तित्व कांग्रेस पार्टी के नेताओं जैसा है. उन्‍होंने शिवशक्ति-भीमशक्ति का गठन करके गठबंधन की राजनीति भी करने की कोशिश की और मी मुंबईकर जैसे अभियान शुरू किए. उनका व्यक्तित्व राज ठाकरे की तरह आक्रामक नहीं है, लेकिन उद्धव ने किसानों की कर्ज माफी और मज़दूरों की अन्य समस्याओं के मुद्दों को उठाया, जिस पर शिवसेना और मनसे ने कभी ध्यान नहीं दिया.

    महाराष्‍ट्र चुनाव 2019 के बाद उद्धव ठाकरे ने अपने बड़े बेटे आदित्‍य ठाकरे को सीएम बनाने की मांग की.


    बेटे को सीएम बनाने पर अड़ गए उद्धव ठाकरे
    महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव 2019 के बाद शिवसेना ने बीजेपी से बारी-बारी से मुख्‍यमंत्री बनाए जाने की मांग की. शिवसेना ने पहली बार ठाकरे परिवार के किसी व्‍यक्ति को सत्‍ता में भागेदारी की मांग की थी. शिवसेना का कहना था कि पहले उद्धव ठाकरे के बेटे और वर्ली विधानसभा क्षेत्र से विधायक आदित्‍य ठाकरे को सीएम बनाया जाए. इससे पहले तक ठाकरे परिवार का सत्‍ता में दखल तो रहता था, लेकिन कोई सदस्‍य सीधे सत्‍ता में शामिल नहीं होता था. बीजेपी शिवसेना की मांग मानने को बिलकुल तैयार नहीं थी. यहीं से दोनों देलों के तीन दशक पुराने गठबंधन में दरार पड़ने की शुरुआत हो गई. इसके बाद शिवसेना ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की कवायद शुरू कर दी. शिवसेना के इस कदम ने बीजेपी के साथ उसके गठबंधन के ताबूत में आखिरी कील ठोकने का काम किया.

    'धीमी रफ्तार से दौड़ने वाले कछुए जैसे हैं उद्धव'
    शिवसेना ने गठबंधन तोड़ने से पहले ही किसानों, आरे कॉलोनी जैसे मुद्दों पर बीजेपी का विरोध करना शुरू कर दिया था. उद्धव के करीबी लोगों का कहना है कि वह धीमी रफ्तार से दौड़ने वाले कछुए की तरह हैं, जो आखिर में अपना लक्ष्‍य हासिल कर लेता है. उनके एक पुराने दोस्‍त बताते हैं कि 1997 में उद्धव और राज ठाकरे बैडमिंटन खेलने जाते थे. एक दिन वह खेलते समय गिर पड़े तो राज हंसने लगे. इसके बाद उन्‍होंने राज के साथ खेलना बंद कर दिया. उन्‍होंने राज के ही कोच से दूसरी जगह पर बैंडमिंटन की ट्रेनिंग ली और बैडमिंटन में महारत हासिल की. वह धीमी रफ्तार से लगातार चलकर दौड़ जीतने वाले लोगों में से हैं. अब महाराष्‍ट्र में उद्धव ठाकरे के पास अपनी व्‍यवहारिकता को साबित करने का पूरा मौका है.
    (लेखक पत्रकार और 'द कजिंस ठाकरे: उद्धव, राज एंड द शैडो ऑफ देयर सेनाज' के लेखक हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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    Tags: Aditya thackeray, Bal thackeray, BJP, Congress, Devendra Fadnavis, Maharashtra, Maharashtra Assembly Election 2019, NCP, Shiv sena, Uddhav thackeray

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